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Sushil Sarna's Blog – May 2018 Archive (15)

नमक सी जलन...

नमक सी जलन  ..... 

मत समेटो
हृदय में
शूल सी स्मृतियों को
ये
जब तक रहेंगी
अपने लावे से
विगत पलों को
सुलगाती रहेंगी
इसलिए
रोको मत
बह जाने दो
इन
नमक सी जलन देती
स्मृतियों की खारी ढेरियों को
आंसूओं के
प्रपात में

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on May 25, 2018 at 8:37pm — 7 Comments

क्षणिकाएं :

क्षणिकाएं :

१.
तूफ़ान का अट्टहास
विनाश का आभास
काँपती रही
लौ दिए की
झील की लहरों पर
देर तक
आंधी के साथ हुए
जीवन मृत्यु के संघर्ष को
याद करके

२.
श्वास
नितांत अकेली
देह
चिता की सहेली
जीवन
अनबुझ पहेली

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on May 23, 2018 at 6:37pm — 9 Comments

स्मृति ...

स्मृति ...

ज़िंदगी
जब
ढलान पर होती है
उसके अंतस में
बुझे अलाव होते हैं
एक शाश्वत डर की आहट होती है
कुछ अनसुलझे सवाल होते हैं
कुछ अधूरे जवाब होते हैं

ज़िंदगी
धीरे -धीरे
बिना पड़ाव के पथ पर
अग्रसर होती है
आँखों में ओस होती है
प्रभात और साँझ एक हो जाते हैं
आहट यथार्थ हो जाती है
और एक श्वास
अंतिम हो जाती है
ज़िंदगी
स्मृति हो जाती है

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on May 21, 2018 at 5:45pm — 1 Comment

ज़रा से रूठ जाने पर ...

ज़रा से रूठ जाने पर ...





अजब

मिज़ाज है

नादाँ दिल का

तोड़ देता है

हर रस्म

उनके

ज़रा से रूठ जाने पर



जो लम्हे

मेरी हयात

बन कर आये थे

तारीकियों में

रूठ गए

हयात-ए-शरर के

ज़रा से रूठ जाने पर



क्या ख़बर

बाद मेरे फ़ना होने के

क्या गुजरी होगी

ख्वाब-ए-माहताब पर

यक़ीनन

मैंने ही नहीं

उनके लम्हों ने भी

पायी होगी सज़ा

ज़ार ज़ार रोने की

तन्हाईयों में

ख़ुद के ही

ज़रा से रूठ… Continue

Added by Sushil Sarna on May 17, 2018 at 1:01pm — No Comments

हरजाई ....

हरजाई ....

ये

वो गालियां हैं

जहां

अंधेरों में

सह्र होती है

उजाले उदास होते हैं

पलकों में

खारे मोती

होते हैं

बे-लिबास जिस्म,

लिपे -पुते चेहरे,

शायद

बाजार में

बिकने की

ये पहली जरूरत है

इक रोटी के लिए

सलवटों से खिलवाड़

रौंदे गए जिस्म की

बिलखती दास्ताँ हैं

भोर

एक कह्र ले कर आती है

पेट की लड़ाई

शुरू हो जाती है

दिन ढलने के साथ -साथ…

Continue

Added by Sushil Sarna on May 16, 2018 at 11:30am — 2 Comments

नहीं जानती ...(350 वीं कृति )

नहीं जानती ...(350 वीं कृति )

नहीं जानती

तुम किस धागे से

रिस्ते हुए ज़ख्मों पर

ख़्वाबों का

पैबंद लगाओगे

नहीं जानती

तुम किस चाशनी में डुबोकर

ज़ख़्मी लम्हों को

मेरी आँखों की हथेली पर

सजाओगे

नहीं जानती

तार तार हुए

ख़्वाबों के लिबास

कैसे बेशर्मी को

नज़रअंदाज़ कर पाएंगे

मगर

जानती हूँ

तुम फिर से

मेरे

संग-रेज़ों में तकसीम ख़्वाबों को

अपने शीरीं…

Continue

Added by Sushil Sarna on May 14, 2018 at 5:30pm — 4 Comments

यौवन रुत ...

यौवन रुत ...

चक्षु आवरण पर

प्रत्यूष का सुवासित स्पर्श

यौवन रुत की प्रथम अंगड़ाई का

प्रतीक था

आँखों की स्मृति वीचियों पर

अखंडित लालसाओं की तैरती नावें

बहुबंध में सिमटी

अमर्यादित अभिलाषाओं की

प्रतीक थी

मौन अनुबंधों के अंतर्नाद

निष्पंद देह में

उन्माद क्षणों के चरम अनुभूति के

प्रतीक थे

मयंक मुख पे

केश मेघों की अठखेलियाँ

कामनाओं की अनंत तृषा की

प्रतीक…

Continue

Added by Sushil Sarna on May 14, 2018 at 4:59pm — 10 Comments

डूब गए ...

डूब गए ...

तिमिर
गहराने लगा
एक ख़ामोशी
सांसें लेने लगी
तेरे अंदर भी
मेरे अंदर भी


तैर रहे थे
निष्पंद से
कुछ स्पर्श
तेरे अंदर भी
मेरे अंदर भी


सुलग रहे थे
कुछ अलाव
चाहतों की
अदृश्य मुंडेरों पर
तेरे अंदर भी
मेरे अंदर भी


डूब गए
कई जज़ीरे
ख़्वाबों के
खामोश से तूफ़ान में
तेरे अंदर भी
मेरे अंदर भी

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on May 9, 2018 at 3:21pm — 2 Comments

संग दीप के .....

संग दीप के  ... 

जलने दो

कुछ देर तो

जलने दो मुझे

मैं साक्षी हूँ

तम में विलीन होती

सिसकियों की

जो उभरी थी

अपने परायों के अंतर से

किसी की अंतिम

हिचकी पर

मैं साक्षी हूँ

उन मौन पलों की

जब एक तन ने

दुसरे तन को

छलनी किया था

मैं

बहुत जली थी उस रात

जब छलनी तन

मेरी तरह एकांत में

देर तक

जलता रहा

मैं साक्षी हूँ

उस व्यथा की

जो…

Continue

Added by Sushil Sarna on May 9, 2018 at 2:30pm — 4 Comments

क्षणिकाएं : ....


क्षणिकाएं : ....

१,
मौत
देती है
ज़िंदगी
मौत को

२.
शूल के
प्रतिबन्ध से
पुष्प
वंचित रहा
स्पर्श से

३.

मयंक
आधी खाई रोटी से
लुभा रहा था
अन्धकार को

सुशील सरना

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on May 8, 2018 at 12:27pm — 2 Comments

सुलगन :....

सुलगन :

तुम
अपना तमाम धुआँ
मुझे सौंप
चले गए
मुझे अकेला छोड़

मेरी देह
तुम्हारे धुएँ की गर्मी से
देर तक
ऐसे सुलगती रही
जैसे
गरम सिगरेट की
झड़ी हुई राख से
सुलगती है
कोई
ऐश -ट्रे
देर तक

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on May 7, 2018 at 4:21pm — 8 Comments

अपने भीतर ...

अपने भीतर ...





थक गया था

बरसों तक

अपने भीतर के एकांत को

जीते जीते

इसीलिये

एक दिन

अपने भीतर की दीवार को तोड़

मैं अदृश्य अदेह में

चला गया



अब जब मैं

स्वयं से बहुत दूर जा चुका हूँ

भूल चुका हूँ

भीतर लौटने की

तमाम राहें

तो अब मुझे

उद्वेलित कर रही हैं

अपने भीतर की

तमाम सुखद स्मृतियाँ

जो कभी गुजारी थी

मैंने

अपने भीतर के एकांत में



अब

सम्पूर्ण सृष्टि की भटकन

मेरा… Continue

Added by Sushil Sarna on May 5, 2018 at 4:39pm — 5 Comments

मजदूर ...

मजदूर ...

अनमोल है वो

जिसे दुनिया

मजदूर कहती है

इसी के बल से

धरातल पर

ऊंचाई रहती है

कहने को

मेरुदंड है वो

धरा के विकास का

आसमानों को छूती

अट्टालिकाएं बनाने वाला

जो

तिनकों की झोपड़ी में रहता है

वो

सृजनकर्ता

मजदूर कहलाता है

हर आज के बाद

जो

कल की चिंता में डूबा रहता है

कल का चूल्हा

जिसकी आँखों में

सदा धधकता रहता है

कम होती…

Continue

Added by Sushil Sarna on May 4, 2018 at 3:49pm — 6 Comments

कल, आज और कल ....

कल, आज और कल ....

वर्तमान का अंश था

जो बीत गया है कल

अंश होगा वर्तमान का

आने वाला कल

वर्तमान के कर्म ही

बन जाते हैं दंश

वर्तमान से निर्मित होते

सृजन और विध्वंस

वर्तमान की कोख़ में

सुवासित

हर पल के वंश

वर्तमान से युग बनते

युग में कृष्ण और कंस

कागा धुन निष्फल होती

मोती चुगता हंस

चक्र सुदर्शन कर्म का

करे निर्धारित फल

कर्म बनाएं वर्तमान को

कल, आज और कल



सुशील सरना

मौलिक एवं…

Continue

Added by Sushil Sarna on May 2, 2018 at 4:21pm — 8 Comments

नश्वरता .....

नश्वरता ....

तुम

कहाँ पहचान पाए

उस बुनकर की

आदि और अंत की

अनंत बुनती को

तुम

बुनकर बन

असफल प्रयास करते रहे

विधि के बनाये

आदि और अंत के

नग्न शरीर की

कृति पर

सच-झूठ ,अच्छा-बुरा ,

तेरा-मेरा ,पाप-पुण्य की सजावट से

दुनियावी वस्त्रों को

अलंकृत करने का

मैं

धागा था

तुम्हारे दर्द का

तुम

बुनकर हो कर भी

मुझे न पहचान पाए

जानते हो

उसकी

और…

Continue

Added by Sushil Sarna on May 2, 2018 at 3:32pm — 12 Comments

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