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रक्षिता सिंह's Blog – June 2018 Archive (7)

जरा ज़ुल्फें हटाओ....(ग़ज़ल)

जरा ज़ुल्फें हटाओ चाँद का दीदार मैं कर लूँ !

बस्ल की रात है तुमसे जरा सा प्यार मैं कर लूँ !!



बड़ी शोखी लिए बैठा हूँ यूँ तो अपने दामन में !

इजाजत हो अगरतो इनको हदके पार मैंकरलूँ!!



मुआलिज है तू दर्दे दिल का ये अग़यार कहते हैं!

हरीमे यार में खुद को जरा बीमार मैं कर लूँ !!



यूँ ही बैठे रहें इकदूजे के आगोश में शबभर !

जमाना देख ना पाये कोई दीवार मैं कर लूँ !!



तुझे लेकर के बाहों में लब-ए-शीरीं को मैं चूमूँ !

कि होके बेगरज़ अब इकनहीं…

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Added by रक्षिता सिंह on June 28, 2018 at 3:16pm — 11 Comments

आप बीती...

इक आवारा तितली सी मैं

उड़ती फिरती थी सड़कों पे...



दौड़ा करती थी राहों पे

इक चंचल हिरनी के जैसे ...



इक कदम यहाँ इक कदम वहाँ

बेपरवाह घूमा करती थी...



कर उछल कूद ऊँचे वृक्षों के

पत्ते चूमा करती थी...



चलते चलते यूँ ही लब पर

जो गीत मधुर आ जाता था...



बदरंग हवाओं में जैसे

सुख का मंजर छा जाता था...



बीते पल की यादों से फिर

मैं मन ही मन भरमाती थी...



इठलाती थी बलखाती थी

लहराती फिर…

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Added by रक्षिता सिंह on June 21, 2018 at 11:30pm — 16 Comments

बेबसी...

तपती धूप,

जर्जर शरीर,

फुटपाथ का किनारा,

बदन पर पसीना,

किसी के आने के इन्तजार में...

पथराई सी आँखें,

घुटनों पर मुँह रखे-

एक टक, एक ही दिशा में देख रही थीं...



- ना जाने कब से?



यूँ तो सामने दो छतरी पड़ी थीं, पर

कड़ी धूप में जल-जल के,

बदन काला पड़ गया था ....



रंग बिरंगे रूमाल -

सजे तो बहुत थे, पर

जिस्म पसीने में लथपथ था....



सफेद बाल,

तजुर्बों की गबाही दे रहे थे....

जिस्म पर लटकती खाल…

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Added by रक्षिता सिंह on June 19, 2018 at 6:30am — 11 Comments

तुम्हारे स्पर्श से....

मैं संग चल दी उनके,

मेरा मन यहीं रह गया...

उन्होंने दिखाये होंगे हजारों ख्वाब,

पर इन आँखों में रौशनी कहाँ थी !!

कितने ही गीत सुनाये होंगे उन्होंने,

पर इन कानों के पट तो बंद हो चुके थे !!

उनके सबालों का,

जबाब भी ना दे पायी थी मैं....

क्योंकी इन होठों पे, तुम्हारा ही नाम रखा था!!

कितना आक्रोश था उनके ह्रदय में,

जब उन्होंने,

मेरे केशों को पकड़कर खींचा था...

और मैं पत्थर सी हो गयी थी,

किसी भी आघात की पीड़ा ना हुई…

Continue

Added by रक्षिता सिंह on June 15, 2018 at 5:12pm — 10 Comments

क्या वो लौटा सकता था ?

बड़े ही तैश में आकर'

उसने मेरे खत लौटा दिये...



वो अँगूठी !



वो अँगूठी भी उतार फेंकी-

जिसे आजीवन,

पास रखने का वादा किया था उसने!



कभी ईश्वर को साक्षी मानकर-

एक काला धागा,

पहनाया था उसने मुझे-



"अब तुम मेरी हो चुकी हो "

फिर ये कहकर,

बाहों मे भर लिया था...



आज,फर्श पर कुछ मोती-

औंधे पड़े हैं....

उस काले धागे के साथ !



एक तस्वीर थी जो,

साथ में -

आज उसे भी,

माँग बैठा था…

Continue

Added by रक्षिता सिंह on June 11, 2018 at 7:45am — 12 Comments

मुद्दतों बाद....

मुद्दतों बाद जब देखा उन्हें तो,

कुछ हुआ ऐसा-

जो रखने राज थे,

उनका भी हम इज़हार कर बैठे।।



तमाम उम्र से ज़ुल्मत भरी,

आँखों में थी लेकिन-

वो होकर रूबरू,

दीदा-ए-नम बेदार कर बैठे।।



अभी तक जो किया करते थे,

बस तक्ज़ीब उल्फत को-

पशेमाँ हो गये अब,

वो जो हमसे प्यार कर बैठे ।।



मुसलसल खुद हमें ताका किये,

वो शोख नज़रों से-

जो खोले लव,

फकत एक बोस पर तकरार बैठे ।।



बेसबब तोहबतें हम पर लगाकर,

हो गये…

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Added by रक्षिता सिंह on June 7, 2018 at 2:18pm — 9 Comments

आ भी जा...

इन आँसुओं का कर्ज चुकाने आजा,

बिखरी हूँ मैं यूँ टूटकर उठाने आजा...



दिल से लगाके मुझको, यूँ न दूर कर तू

इक बार फिर तू मुझको सताने आजा....



अब लौट आ तू फिर से, इश्क की गली में

करके गया जो वादे निभाने आजा...



जो वेबजह है दर्मियाँ, उसको भुला दे

इक बार फिर से दिल को चुराने आजा...



सोती नहीं अब रात भर, तेरी फिकर में

इक चैन की तू नींद सुलाने आजा...



थमने लगीं साँसे मेरी, तेरे बिना अब

अरमान है तू दिल से लगाने…

Continue

Added by रक्षिता सिंह on June 6, 2018 at 12:39pm — 8 Comments

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