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नाथ सोनांचली's Blog – September 2017 Archive (4)

सपना (हास्य व्यंग्य)

क्या दिन थे आनन्द भरे वे, हरपल रहता था उल्लास|

आगे जीवन ऊबड़ खाबड़, तनिक न था इसका आभास||

बीबी बच्चों के चक्कर में, स्वप्न हुए अब तो इतिहास|

आफत आन पड़ी है मुझपर, दोस्त उड़ाते हैं उपहास||



कभी उड़ा था नील गगन में, मैं भी अपने पंख पसार|

पंख लगाकर समय उड़ा वो, हुआ बिना पर मैं लाचार||

जीवन अपना शुष्क धरा सा, मस्ती का उजड़ा संसार|

ऐसा चिर पतझड़ आएगा, कभी नहीं था किया विचार||



जाने कौन घड़ी थी वो भी, जब शादी का किया ख़याल|

किस्मत ऐसी फूटी भइया,… Continue

Added by नाथ सोनांचली on September 26, 2017 at 7:30pm — 18 Comments

दबी हर बात जिंदा क्यूँ करें हम (ग़ज़ल)

बह्र -मुफाईलुन मुफाईलुन फ़ऊलुन



तुम्हारा राज़ इफ़शा क्यूँ करें हम|

दबी हर बात जिन्दा क्यूँ करें हम||



न हो जो भाग्य को यारों गवारा,

फिर उसकी ही तमन्ना क्यूँ करें हम||



जगाती दर्द हो जो बात दिल में,

उसी का रोज चर्चा क्यूँ करें हम||



लगा दे आग जो सारे जहाँ में ,

कोई भी ऐसी रचना क्यूँ करें हम||



जिसे करके रहे अफ़सोस मन में,

कोई भी काम ऐसा क्यूँ करें हम||



बहन माँ बेटियाँ तुहफ़ा ख़ुदा का,

उन्ही पे कोई हिंसा… Continue

Added by नाथ सोनांचली on September 18, 2017 at 8:00am — 27 Comments

तरही ग़ज़ल (है अजब चीज मुहब्बत मुझे मालूम न था)

ख़ुद से हो जाएगी नफरत मुझे मालूम न था

है अजब चीज़ मुहब्बत, मुझे मालूम न था ||



गम से हो जायेगी उल्फ़त मुझे मालूम न था

ऐसी होगी मेरी क़िस्मत मुझे मालूम न था ||



दूध में कोई नहाये कोई भूखा ही रहे

ऐसे होती है सियासत मुझे मालूम न था ||



ख़्वाब में रोज़ ही मिलते थे मग़र, यार मेरे

ख़्वाब होगा ये हक़ीक़त मुझे मालूम न था ||



वहम इक पाल लिया था मेरे दिल ने यूँ ही

थी उसे हँसने की आदत मुझे मालूम न था ||



यार कहता था ग़ज़ल वक़्त… Continue

Added by नाथ सोनांचली on September 4, 2017 at 1:44pm — 20 Comments

गुरु (लघुकथा)

बस खचाखच भरी हुई थी। चुकि मैं पहले आ गया था, इसलिए मुझे सीट मिल गयी थी, बावजूद इसके भीड़ का असर मुझ पर भी हो रहा था।



यकायक मेरी नजर एक ऐसे शख्स पर गयी, जो मुझे बचपन के दिनों में गणित पढ़ाया करते थे। वे भी बस में खड़े खड़े भीड़ के दबाव को झेल रहे थे। लगभग 30 साल पहले, एक हृष्ट पुष्ट युवा को आज एक कमजोर असहाय बुजुर्ग के रूप में देखकर पहले पहचानने में थोड़ी असहजता हुई पर ध्यान से देखने पर मैं उन्हें भली भांति पहचान गया ।



मैं उठा और प्रणाम कर अपनी सीट पर उन्हें बैठने का आग्रह… Continue

Added by नाथ सोनांचली on September 3, 2017 at 2:00pm — 13 Comments

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