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डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव's Blog – September 2014 Archive (6)

मानदंड

 

 

रेखागणित क्या है ?

मै नहीं जानता

रैखिक ज्ञान का पारावार है

मान लेता हूँ

मेरे लिए रेखा मात्र रेखा है

सरल या विरल

सरल यानि मिलन से दूर

मिलन के लिए सरलता नहीं

तरलता चाहिए

अकड़ नहीं विनम्रता चाहिए

इसीलिये सरल रेखा

मुड़ कर ही मिल पाती है

वह भी स्वयं से

उसका पोर-पोर ही है मिलन बिंदु

जिसका चरम रूप है वृत्त

वृत्त क्या ? महज एक शून्य

शून्य अर्थात शून्य

स्वयं से मिलन…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 26, 2014 at 2:57pm — 14 Comments

एक दिन

अरे चाचा !

तुम तो बिलकुल ही बदल गये

मैंने कहा – ‘ तुम्हे याद है बिरजू 

यहाँ मेरे घर के सामने

बड़ा सा मैदान था 

और बीच में एक कुआं 

जहाँ गाँव के लोग

पानी भरने आते थे 

सामने जल से भरा ताल 

और माता भवानी का चबूतरा

चबूतरे के बीच में विशाल बरगद

ताल की बगल में पगडंडी

पगडंडी के दूसरी ओर

घर की लम्बी चार दीवारी

आगे नान्हक चाचा का आफर

उसके एक सिरे पर

खजूर के दो पेड़ 

पेड़ो के पास से…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 21, 2014 at 12:14pm — 19 Comments

हिन्दी की जय !

हिन्दी दिवस पर विशेष

           

माँ तुझको  याद  नहीं करते  तू तो धमनी  में है बहती I

तू ह्रदय नही इस काया की  रोमावली  प्रति में  है रहती I

अपने  ही पुत्रो से  सुनकर  भाषा  विदेश  की  है सहती I

पर माते ! धन्य नहीं मुख से कोई भी अपने दुःख कहती I

 

होते कुपुत्र  भी इस जग में  पर माता उन्हें  क्षमा करती I

सुंदरता  और  असुंदर  को  जैसे  धारण  करती  धरती I

जो सेवा-रत अथवा …

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 13, 2014 at 8:44pm — 6 Comments

बोध (नवगीत)

मौत का सघन  साया

अनुभूति बनकर आया

मेरे अंतिम क्षणों में I

*

यह आत्मीयता प्रदर्शन

करुणा  का कलित क्रंदन

चीत्कार आर्त्त रोदन

या नाट्य  अभिनय मंचन

.

इसे देख जी में आया 

छोडूं न अभी काया

मेरे अंतिम क्षणों में I

*

सर्वांग व्यथित परिजन

सूने उदास से मन

इतना असीम कम्पन

तब था न  जब था जीवन

.

यह मोह है या माया

कुछ कुछ समझ में आया

मेरे अंतिम क्षणों में…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 10, 2014 at 1:30pm — 23 Comments

रूप अनूप निहारा करूँ /// सवैय्या

 विधान : 7  सगण + 1 एक रगण (कुल 24 वर्ण )

 

घन राति अमावस पावस की तम तोम म बैठि  गुजारा करूँ I 

गुनिकै मन मे रतनाकर के जल नील क नक्श उतारा करूँ  I

सुषमा नभ की अवलोकि सदा मन में यहु भाव विचारा करूँ I

जग माहि रचा व बसा   प्रभु  का वह रूप अनूप निहारा करूँ I

 

*                                         *                                     *

करि सम्पुट नैन भली विधि सों, प्रभु को धरि ध्यान निहारा करूँ I

कछु भक्ति करूँ, कछु ध्यान धरूँ,…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 5, 2014 at 8:00pm — 19 Comments

शिक्षक दिवस पर विशेष

शिक्षक यदि तुम गुरु बन जाते

कोटि-कोटि छात्रो के मस्तक चरणों में झुक जाते I

 

तुम ही अपना गौरव भूले

लोभ -मोह  झूले पर झूले

व्यर्थ दंभ पर फिरते फूले

थोडा सा पछताते I

 

धर्म तूम्ही ने अपना छोड़ा

अध्यापन से मुखड़ा मोड़ा

राजनीति से  नाता जोड़ा

तब भी न शरमाते  I

 

कितनी धवल तुम्हारी काया

तुमने उस पर मैल चढ़ाया

शिक्षा को व्यवसाय बनाया

फिरते हो इतराते I  

 

पद्धति की भी बलिहारी…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 5, 2014 at 10:29am — 12 Comments

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