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Sheikh Shahzad Usmani's Blog – September 2017 Archive (9)

फटी आंखें (लघुकथा) / शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"तुम अपने काम संभालो! अपने काम निपटा कर मैं आता हूं।" रोज़ाना की तरह आज भी वह शायद वहीं गया था, जहां शंका थी। लक्ष्मी उसकी राह देख रही थी। कितना हंसमुख, सुंदर, ख़ुशमिज़ाज और हृष्ट-पुष्ट भाई है उसका। हम ग़रीबों के पास ये ही तो प्रभु के उपहार हैं। लेकिन रईस हमारी इन नियामतों पर भी डाका डाल देते हैं। लक्ष्मी बड़े भाई के बारे में सोच-सोच कर परेशान हो रही थी।



"भैया, मैं भी अब जवान हो रही हूं। मां-बाप की मज़बूरियां तो समझती हूं, लेकिन कम से कम तुम तो मेरे बारे में सोचो! उस रईस मेम साहब के… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on September 29, 2017 at 12:09pm — 6 Comments

बाज़ार में जूतमपैजार (लघुकथा)/ शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"अब्बू, चलिए जूतों की दुकान पर!"
"नहीं बेटा, ई़़द़ के लिए तुम ही कोई सस्ती सी चप्पलें ख़रीद लाओ मेरे लिए!"
"आप भी चलिये न, दिल बहल जायेगा!" सुहैल ने अपने अब्बू को पलंग से लगभग उठाते हुए कहा।
"ख़ाक दिल बहलेगा। वहां तो ऐसा लगता है कि ग्राहक, दुकान के नौकर और मालिक और जूते-चप्पलों की कम्पनियां सब एक-दूसरे को जूते मार रहे हों!"
"हां, सो तो है! जूतमपैजार और हमें ग़रीबी का अहसास!" सुहैल ने अब्बू को पलंग पर लिटाते हुए कहा।

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by Sheikh Shahzad Usmani on September 24, 2017 at 10:44am — 9 Comments

सूत्र और सूत्रधार (लघुकथा)/शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"छोटा सा काम हो या बड़ा, छोटा लक्ष्य हो या बड़ा; कुछ हासिल करने के लिए सबसे पहले सूत्र चाहिए, जुगाड़ चाहिए, बस!"

"हां, सूत्र से सूत्र मिलते हैं, कड़ी से कड़ी जुड़ती है, तभी मंज़िल का रास्ता तय होता है!"

इन दोनों की बातें सुनकर तीसरे व्यक्ति ने कहा- "लेकिन मेरे तो यही सूत्र हैं कि लातों के भूत बातों से नहीं मानते, इसकी टोपी उसके सर और उंगली पकड़कर कर पौंछा पकड़ना!"

यह सुनकर चौथा व्यक्ति अपना सीना तान कर खड़ा हुआ और बोला- "इनमें मेरी सफलता के सूत्र भी जोड़ दो। छोटा हो या बड़ा;… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on September 23, 2017 at 11:50pm — 15 Comments

मुद्दों में मुद्रायें (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"मैंने यह तो कहा नहीं कि शादी के बाद हम यह देश ही छोड़ देंगे! मैं तो यह कह रहा हूं कि अधिक से अधिक डॉलर जुटाने के लिए अभी से नोटों की जुगाड़ करनी चाहिए हम दोनों को!"

"सही कहा तुमने। आदर्शवादी बनने और सबका सोचने के चक्कर में न देश में मज़े कर पाये और न ही विदेश में! तुम अपने पिता से अपना हक़ मांगों और मैं दहेज़ के बजाय नक़द पैसों की बात कर लूंगी पापा से!"

अरुण के विचारों का समर्थन करते हुए मंजू ने एक बार फिर से अनुरोध करते हुए उस से कहा- "अब हमें अपनी शादी और नहीं टालनी चाहिए। इतनी… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on September 16, 2017 at 2:19am — 6 Comments

अरमान और बिदाई (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"लगता है कि रास्ता भूल गई है।"



"काफ़ी देर से बैठी है, कोई मानसिक रोगी है या पागल है!"



"नहीं भाई, कपड़े तो साफ़ सुथरे हैं, शायद किसी से बिछड़ गई है!"



एक पेड़ के नीचे बैठी वह औरत लोगों की टिप्पणियां सुन तो रही थी लेकिन कहीं खोई हुई थी। उसके कानों में अभी भी बैंड-बाज़ों की आवाज़ें सुनाई दे रहीं थीं। फूल-मालाओं से लदे जीप में बैठे अपने पति के अपने प्रति रवैए से वह बहुत आहत थी। अत्यल्प-शिक्षित थी। बरसों से अपने बेटे-बहू के साथ ही 'किसी तरह' रह रही थी। पति द्वारा लाख… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on September 14, 2017 at 7:54pm — 6 Comments

रोशनी में सिसकियां (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

रोशनी की किरण के रास्ते को जब उस युवती ने अपनी हथेली से बाधित किया तो उसकी चारों उंगलियां लालिमा पाकर उसे भाव संसार में ले गईं।

"लोकतंत्र के चारों स्तंभों में नारी भी सक्रिय है, नारी का महान योगदान है!" यही तो उसकी मां ने उसे बताया, समझाया और फिर इस लायक बनाया कि वह आज इन सभी के संपर्क में है बतौर मीडियाकर्मी। मां की मधुर स्मृतियां उसे भाव संसार में ले गईं। कुछ पल ही गुज़रे कि उसकी आंखों से आंसू लाल गालों को गर्माहट सी देने लगे।

"परिपक्व कहलाने वाले हमारे इस लोकतंत्र के चारों स्तंभ आज… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on September 9, 2017 at 11:23pm — 12 Comments

आज की बेटी (क्षणिकाएं या अतुकान्त) / शेख़ शहज़ाद उस्मानी

पापा की बेटी

या

बाबा की बेटी।



देश की बेटी

या

वेश में बेटी।



स्वतंत्र बेटी

या

क़ैद में बेटी।



हेर-फेर में बेटी

या

डेरे-फेरे में बेटी।



हाथ बंटाती बेटी

या

'हाथ की सफाई' में बेटी।



गौरवशाली बेटी

या

कलंककारी बेटी।



उठती, उड़ती बेटी

या

उठाती, उड़ाती बेटी।



चौंकती बेटी

या

चौंकाती बेटी।



जीतती, जीती बेटी

या

हारती, मरती… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on September 6, 2017 at 9:09pm — 5 Comments

घर के टीचर (लघुकथा) / शेख़ शहज़ाद उस्मानी

हल्कू ने बहुत दिनों बाद अपने बेटे कल्लू की पढ़ाई-लिखाई संबंधित पूछताछ करते हुए उससे अगला सवाल किया- "तुम्हारे इंग्लिश टीचर कौन हैं!"



कल्लू : "वो तो हमारे नसीब में नहीं हैं!"



हल्कू : "क्या कहा?"



कल्लू : "सच कहा। हमें केवल इंडियन टीचर ही पढ़ाते हैं!"



हल्कू : "अबे, मैं अंग्रेज़ी के बारे में पूछ रहा हूं!"



कल्लू : "लेकिन मैंने तो आपके हाथ में केवल देसी देखी है, क्या अब आप अंग्रेज़ी भी लेने लगे?"



हल्कू : " अबे, मैं दारू की नहीं,… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on September 5, 2017 at 7:39pm — 7 Comments

'पार्टियां अभी बाक़ी हैं !' (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी :

'पार्टियां अभी बाक़ी हैं !' (लघुकथा) :



एक दफ़्तर में त्योहार के अवकाश के बाद समोसे-कचौड़ी-आहार-रूपेण बधाईयों का दौर या 'दौरा सा' चला। सब अपने काम फिर से शुरू करने ही वाले थे कि उनमें से एक ने दूसरे से कहा- "कल तो तूने बधाई तक नहीं दी मेरे त्योहार पर! सोशल मीडिया पर मेरे धर्म और रीति-रिवाज़ों की जम कर खिल्ली उड़ा रहा था! उससे तेरे को कोई मेडल या अवार्ड मिल गया क्या?"

"तेरे को मिल गया क्या उन रीति-रिवाज़ों को दोहरा-दोहरा कर?" दूसरे ने कहा।

"तुझे तेरी कट्टरपंथी और पोंगापंथी से… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on September 3, 2017 at 10:10am — 8 Comments

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