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Kanta roy's Blog – October 2015 Archive (10)

कैश बाॅक्स के नजारे

साफ़ नीला आसमान

सफेद रूई सा हल्का

बिलकुल हल्का ,

हल्का वाला सफेद बादल

कभी बहुत भारी सा हो जाता है

वक्त रेशम सी ,

रेशम सी मुलायम वक्त

फिसलती हुई ,सरकती हुई

रेशमी सा एहसास देती हुई गुजर जाती है

वक्त के वजूद में

जाने क्यों पहिए होते है

जो दिखाई नहीं देते पर ब्रेक नहीं होते है

शायद ब्रेक भी रहें हो कभी लेकिन

आजकल वक्त  नहीं रूकता

यहाँ बाजार में बहुत भीड़ है

यह भीड़ कभी खत्म नहीं…

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Added by kanta roy on October 31, 2015 at 10:09am — 6 Comments

बेरोजगारी / लघुकथा

कमरे में घुसते हुए वह अपनी चाल को संतुलित कर रहा था ,पर बैठते हुए थोडा़ लड़खड़ा गया ।



" आज इतनी देर कैसे कर दी आपने , कहाँ रह गये थे , खाना लगा दूँ ? " बाहर आॅफिस , घर में बेरोजगार पति , दोनों को ही काँच के बर्तन के समान संभालने की जिम्मेदारी भी वह बखूबी निभा रही थी कि आज ऐसे ....!



नजदीक जाकर गौर से देखी तो उनकी आँखें लाल हो रही थी । अचानक वह सोफे पर ही लुढ़क गया । एक पल के लिए उसकी धड़कन जैसे रूक गई ।



" क्या आपने ड्रग लिया है ...? "



" हाँ " अधनींदे… Continue

Added by kanta roy on October 28, 2015 at 8:36pm — 18 Comments

वे दिन भी भले थे...

फूल से दिन खिले थे
साँझ गुलशन सी रही
खुशियों का चलन था
अब विरानी भली

वे दिन भी भले थे

ये साँझ भी है भली

  .......…
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Added by kanta roy on October 21, 2015 at 10:00pm — 14 Comments

खास रिश्ते का स्वप्न / लघुकथा

" ये क्या सुना मैने , तुम शादी तोड़ रही हो ? "

" सही सुना तुमने । मैने सोचा था कि ये शादी मुझे खुशी देगी । "

" हाँ ,देनी ही चाहिए थी ,तुमने घरवालों के मर्ज़ी के खिलाफ़ , अपने पसंद से जो की थी ! "

" उन दिनों हम एक दुसरे के लिए खास थे , लेकिन आज ....! "

" उन दिनों से ... ! , क्या मतलब है तुम्हारा , और आज क्या है ? "

" उनका सॉफ्स्टिकेटिड न होना ,  अर्थिनेस और सेंस ऑफ़ ह्यूमर भी बहुत खलता है।  आज हम दोनों एक दुसरे के लिये बेहद आम है । "

" ऐसा क्यों ? "…

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Added by kanta roy on October 21, 2015 at 4:00pm — 9 Comments

आखिरी स्टेशन का मुसाफिर / कान्ता राॅय

जिंदगी रेल सी

दौडती हुई

भागती हुई

स्टेशन दर स्टेशन

सरक कर रूकती हुई

चढते मुसाफिर

उतरते मुसाफिर

रेलम की पेल में

यादों का कारवां

सीट के नीचे दबकर

रह जाता है

ट्रेन में बैठा

आखिरी स्टेशन का मुसाफिर

सब देखता हुआ

कुछ सोचता हुआ

बैठा रहता है अकेले



साथ बैठ कर

मुँगफली खाते हुए

चाय के सकोरे के संग

बनाए हुए कुछ रिश्ते ,कुछ संवाद और समस्त संवेदनाओं को

अपने बैग में कस कर

कंधे पर डाल

बीच स्टेशन… Continue

Added by kanta roy on October 17, 2015 at 2:33pm — 9 Comments

कुम्हारी / लघुकथा

बाजार में बहुत भीड़ थी आज । क्यों ना हो ,नवरात्रि का पहला दिन, लोग सुबह से ही स्नान ध्यान कर पूजा-पाठ की तैयारी में लगे हुए थे ।

मै भी स्नान कर ,कोरी साड़ी पहन, नंगे पैर माता रानी को लिवाने आई थी । फुटपाथ के उसी निश्चित कोने में , माता रानी विविध रूपों में मुर्ति रूप लिये दुकानों में सज रही थी । कहीं तीन मुंह वाली शेर पर सवार थी , कहीं अपने अष्टभुजा में सम्पूर्ण शस्त्रों के साथ , तो कहीं दस भुजा लेकर महिषासुर का वध करती हुई । काली ,चामुण्डा सबके दर्शन हुए लेकिन मै लेकर…

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Added by kanta roy on October 13, 2015 at 8:00pm — 4 Comments

अंतः स्मरण / लघुकथा

कैंसर का आखिरी चरण , अर्ध बेहोशी की हालत में , जिन्दगी की आखिरी साँस गिन रही थी वो । आॅक्सीजन मास्क भी अब निष्क्रिय सा प्रतीत हो रहा था ।

डूबते हुए लम्हों में कभी आँखें खोलती तो पल भर में बंद कर लेती । आई. सी. यू. वार्ड के बाहर बेटा -बहू , दामाद ,नाती -पोते सब आखिरी विदाई के वक्त साथ रहने की लालसा लिये उपस्थित थे ।



पति नम आँखों से माथे को सहलाते हुए उसे मरणासन्ना देख साथ - साथ बिताये धुप -छाँह जैसे समस्त पल , जिम्मेदारियों का सलीके से निर्वाह करने का भी स्मरण कर रहे थे… Continue

Added by kanta roy on October 11, 2015 at 9:16am — 2 Comments

पथ का चुनाव / लघुकथा

आज फिर किसी विधुर का प्रस्ताव आया है । मन सिहर उठा जवान बच्चों की माँ बनने के ख्याल से ही ।



इस रिश्ते को भी ना कह कर अपने धनहीन दुर्बल पिता को संताप दूँ , या बन जाऊँ हमउम्र बच्चों की माँ । सुना है तहसीलदार है । शायद पिता की वे मदद भी करें उनकी दुसरी बेटियों के निर्वाह में ।



आज काॅलेज में भी मन नहीं लगा था । घर की तरफ जाते हुए पैरों में कम्पन महसूस की थी उसने ।



घंटे की टनकार, मंदिर से उठता हवन का धुँआ , कदम वहीं को मुड़ गये ।



ऊपर २५० सीढ़ियाँ , ऐसे चढ़… Continue

Added by kanta roy on October 9, 2015 at 8:50am — 6 Comments

जोड़ का तोड़ / लघुकथा

पूरे पच्चीस हजार ! ठीक से गिनकर रूपये पर्स में रखे उसने ।

किटी पार्टी खत्म होते ही उमंग भरी तेज कदमों से पर्स को हाथों में भींच घर की तरफ निकल पड़ी ।

पच्चीस महीने में एक बार ये अवसर आता है । हर महीने घर- खर्च से बचा - बचा कर ही यहाँ पैसे भरती रही है ।



" माँ ,आ गई तुम , क्या इस बार भी नहीं खुली तुम्हारी किटी ? "



" खुल गई , देख ! "



" अब तो मेरा कम्प्यूटर आ जायेगा ना ? "



" हाँ , अब उतावली ना हो ,आ जायेगा । "



" देखना माँ ,अबकी बार… Continue

Added by kanta roy on October 6, 2015 at 4:00pm — 12 Comments

अमीरों की बैसाखी (लघुकथा)

" तुम्हारे नम्बर तो मुझसे कम आये थे ना ! फिर ये एडमिशन .... ? "



" रहने दो अब ये सब पूछना - पूछाना ,लो पहले मिठाई खाओ , आखिर तुम्हारा जिगरी दोस्त तो डाक्टर बन रहा है ना ! "



" मतलब ? "



" अरे नहीं समझे अब तक क्या ! वही पुरानी शिक्षा नीति की घटिया चालबाज़ी , डोनेशन ! और क्या ! "



" लेकिन तुम तो कहते थे डोनेशन देकर नहीं पढोगे । अपने कोशिशों की नैया पर सवार रहोगे ! सो , उसका क्या ? "



" कोशिशों की नैया ! हा हा हा हा ....वो सब स्कूली बातें थी ।…

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Added by kanta roy on October 1, 2015 at 7:30pm — 8 Comments

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