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डॉ. अनुराग सैनी's Blog – October 2013 Archive (7)

तलाश की महफिले ------

तलाश की महफिले तो तन्हाईयाँ मिली !

मुझको वफ़ा के बदले  बेवफायियाँ मिली !

 

जिक्रे चाहत पर सदा लब खामोश ही रहे!

मुझको फिर क्यों  इतनी रुश्वायियाँ मिली !

 

मेरे रकीबो को तो साथ उसका मिला !

मुझको उसकी सिर्फ परछाईयाँ मिली !

 

मनायेगा शायद मातम मेरी जुदाई का वो !

सुनने को उसके घर पे शहनाईयाँ मिली !

हुस्न की बदौलत फ़लक को पा  गया  है वो !

मुझको खामोश कब्र सी गहराईयाँ मिली !

 

उसकी तूफ़ान-ए-…

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Added by डॉ. अनुराग सैनी on October 7, 2013 at 6:36pm — 10 Comments

जिंदगी मुझे तमाशा बनाकर चल पड़ी --------

किरण से कुहासा बना कर चल पड़ी !

जिंदगी मुझे तमाशा बना कर चल पड़ी !

समझ नही आता अर्थ किसी को मेरा !

कैसी ये परिभाषा बना कर चल पड़ी !

पा लूँ  अर्श को एक ही छलांग में !

कैसी ये अभिलाषा जगाकर चल पड़ी !

चंद दाद पाकर तसल्ली मिलती नही !

शोहरतों का प्यासा बनाकर चल पड़ी !

बड़ी हस्तियों में हो नाम शामिल मेरा !

मन में ये जिज्ञासा उठाकर चल पड़ी !

किरण से कुहासा बना कर चल पड़ी !

जिंदगी…

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Added by डॉ. अनुराग सैनी on October 6, 2013 at 4:26pm — 11 Comments

आया सावन का मस्त महीना---

ये कैसी है चम् चम् चम् चम् ,

क्यों  बहक रहा है मन,

टूटकर घटा से बरसे पानी,

हो गयी है रुत मस्तानी,

चारो और छायी हरियाली ,

जंगल मनाने लगा दिवाली ,

ऐसे बहे ठंडी बयार,

सपनो से हो जाए प्यार,

तन से टपके सुगन्धित  पसीना ,

लो आया सावन का मस्त महीना !

तन की बजने लगी सितार ,

आँखें देखे सपने हजार,

अपने प्रियतम का करे इंतज़ार ,

जैसे कोई दुल्हन मस्तानी ,

कैसे खुद को काबू कर पाए ,

कैसे अपने दिल…

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Added by डॉ. अनुराग सैनी on October 5, 2013 at 9:17pm — 13 Comments

कविता -------सुबह सुहानी लगती है

छाने लगी सूरज की लाली ,
गाने लगी कोयलिया काली ,
छूमंतर होने लगा अन्धकार ,
मीठी निंद्रा से जागा संसार !
मंद हवा के शीतल झोंके ,
तरोताजा कर जाते है ,
और पत्तो पे बिखरे ओस के मोती ,
गायब कहीं हो जाते है !
सूरज की पहली किरण से ,
अंग अंग मस्त हो जाता है ,
और निंद्रा पूरी कर रात की ,
 आलस कहीं खो जाता है…
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Added by डॉ. अनुराग सैनी on October 4, 2013 at 6:03pm — 5 Comments

नज्म ...........मुलाक़ात अधूरी है

              १

ना जाओ अभी कि मुलाक़ात अधूरी है !

तेरे – मेरे मिलन की हर बात अधूरी है !

 जाने क्यों चल दिए तुम दामन छुडाकर!

शबनमी आँखों से लाज के मोती गिराकर !

पुरसुकूं हुस्न की एक झलक दिखाकर !

अभी नही बुझी आँखों की प्यास अधूरी है !

ना जाओ अभी कि मुलाक़ात अधूरी है !

तेरे – मेरे मिलन की हर बात अधूरी है !

               २

काली बदलियों का आँखों में काजल लगाकर !

कांच के पैमाने में मय का जाम थमाकर !

रुखसारो पे…

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Added by डॉ. अनुराग सैनी on October 2, 2013 at 8:07pm — 13 Comments

उत्थान ----------कविता

दीप बन अँधेरी राहो पे जलने लगा हूँ !

धवल चंद्रमा सा चमकने लगा हूँ !

चीर  कर सीना निशा का  ,

जग के तम को हरने लगा हूँ !

ना दे सहारे को अब कोई बैसाखी !

खुद के पैरो पे जो चलने लगा हूँ !

लडखडाहट का दौर गुजर चुका है !

अब तो मैं सँभलने लगा हूँ !

धो चुका हूँ आँचल के दाग सारे !

फूलों सा अब महकने लगा हूँ !

बंदिशों के पिंजरे तोड़ सारे  !

मुक्त परिंदे सा चहकने लगा हूँ !

जला कर इर्ष्या और कपट को !

ज्वालामुखी सा…

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Added by डॉ. अनुराग सैनी on October 2, 2013 at 2:30pm — 17 Comments

कहानी प्यार के फूल------------

 आज बरसो के बाद उधर जा निकला जहाँ कभी मेरे प्यार की आखरी कब्र बनी थी , उस जगह न जाने कहाँ से दो पीले रंग के फूल खिले थे . आँखों से गंगा जमुना बहने लगी ! सब कुछ ऐसे याद आने लगा की जैसे कल ही की बात हो! मन पुरानी यादों में खो गया ! आज बहुत ज्यादा थक कर सोया था ये प्राइवेट स्कूल की नौकरी भी ना स्कूल वाले पैसे तो कुछ देते नहीं बस तेल निकलने पे लगे रहते है! ओ बेटा जल्दी उठा जा आज छुट्टी है तो क्या शाम तक सोयेगा जा उठकर देख दरवाजे पे कौन है माँ घर के दुसरे कोने पे कुछ काम कर रही थी , माँ की आवाज़…

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Added by डॉ. अनुराग सैनी on October 1, 2013 at 7:30pm — 2 Comments

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