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PHOOL SINGH's Blog – November 2012 Archive (6)

कसाब को फाँसी

सरकार की अपना करो बखान

क्या खूब किया इसने इंसाफ

खाली कर दिया देश खजाना

बचाने को आतंकी मियां “कसाब”

 

हत्याओं की लगा कतार

फाँसी लटके खुद भी यार

पाप की सजा जो तुमने पाई

पाक की इज्जत खाक मिलाई

 

आतंकियों का बन शिरोमणि

ताज पर बमो की झड़ी लगाई

बेगुनाहों का मार के यारा

माफ़ी की फिर गुहार लगाई

 

जख्म भी ऐसे दिए जहाँ को

शैतान भी ले सर झुका

जेल में रह कर भी

पड़ा ना…

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Added by PHOOL SINGH on November 22, 2012 at 11:30am — 6 Comments

दीपावली की शुभकामनाये

         

आओ मिलकर दीप जलाये

दीप, लड़ियों से घर सजा

हर तरह का तम मिटा

जग को प्रकाश की सौगात दिलाये

आओ मिलकर दीप जलाये

 

प्रेम की ज्योति जला के हृदय

बैर से मुक्ति, जग दिलाये

उपहार में बाँट के सदभावना

मीठास की ऐसी रीत चलाये

आओ मिलकर दीप जलाये

 

क्रोध अग्नि को विजित कर

सयंम में खुद नियंत्रित कर

विन्रमता का सबको पाठ पढाये

देश में प्रेम की लहर चलाये

आओ मिलकर दीप…

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Added by PHOOL SINGH on November 10, 2012 at 12:10pm — 4 Comments

दास्ताँ है यें जीव की

दास्ताँ  है यें जीव की

वस्त्र ढ़के, मृत शरीर की

वृद्ध होते ही छोड़ चलें

नींव लिखने, नई तकदीर की

 

प्रीती जाती जब, हृदय जग

दो तनो कर, एक मन

बीज से जाता पराग बन

भू धरा पर ले जन्म

पंचतत्वो का कर संगम

पाया जग में मानव तन

 

शिशु से किशोर तक

रूप बनाया मन भावन

अटखेलियाँ कर कर के

हर्षित करता सबका मन

शिक्षा का वो कर अध्ययन

ज्ञान से करता जग रोशन

 

अध्यन का समय हुआ…

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Added by PHOOL SINGH on November 9, 2012 at 5:32pm — 2 Comments

जीवन की शुरुआत

नये जीवन की शुरुआत करें हम

मृत्यु से ना कभी डरे हम

कर्मभूमि बना धरा को              

स्थापित प्रमाण अपने करें हम

गीता उपदेश को ध्यान रख

समाहित धर्म कर्म को कर

ज्ञान बीज की उपज करें हम

कर्म को पूजा मान के अपनी

चेतना वृक्ष तैयार करें हम

आओ नए जीवन की शुरुआत करें हम

 

आसक्त ना हो भौतिक जगत से

अपने अंतर्मन से ध्यान धरे हम

कौन हूँ मैं, कहा से आया

किस मनसा से जग में आया  

क्या खोया, और…

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Added by PHOOL SINGH on November 8, 2012 at 10:37am — 5 Comments

जिन्दगी का सच-विरह

विरह की बेला चुप सी आती

कर्मभूमि और गृहस्ती में

होले होले कदम बढाती

सुख समृधि को, मिटा

अंतर्मन में भेद करा

मन की शांति, भंग कर जाती

काल चक्र सा एक रचा

रह रह कर

भ्रम जाल में हमें फंसाती

ढंग बेढंग के करतब करा

इन्सान से हमको,

पशु बनाती

वक़्त की नजाकत को समझ

नट बना, इंसान नचाती

ऐसा अपना रंग दिखाती

जब तक समझ में

आता कुछ भी

तब तक सब कुछ

धुल में सब कुछ ये मिलाती

पल भर में ये नेत्र भिगो

हमारे अस्तिव का बोध कराती

लहर…

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Added by PHOOL SINGH on November 5, 2012 at 2:30pm — 1 Comment

मेरे जीवन साथी

वचन दिया जो तुमने प्रीतम

जीवन भर साथ निभाने का

पवित्र अग्नि को साक्षी मान

परिस्तिथियों से ना घबराने का

 

साथ फेरों का बंधन दे

अपना बनाया मेरा मन

हर ख़ुशी कर, मुझे अर्पण

प्रेम की ज्योति चित जगा

कदम मिलाकर चलूंगी में भी

बन संगनी तेरी हमदम

 

सूर्योदय से सूर्यास्त तक

तुझे निहारूं

लम्बी उम्र की दुआ मैं मांगूं

नेत्र में तेरा अक्स बना

तुझे मैं चाहूं उम्र भर

हर पल और जीवन…

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Added by PHOOL SINGH on November 3, 2012 at 1:07pm — No Comments

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