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Ranveer Pratap Singh's Blog – November 2012 Archive (2)

चन्द्रबदन!

चन्द्रबदन!

तेरे कपोल पे तेरे नैनों का नीर

लागे जैसे सीप में मोती

शशी से भी तू सुन्दर लागे

जब ओढ़ चुनर तू है सोती

झरने सी तू चंचल है

सुन्दरता से भी सुन्दर है

सुगंध तेरी  जैसे कोई संदल

चन्द्रबदन, चन्द्रबदन, हय तेरा चन्द्रबदन…

 

तेरे केशों में…

Continue

Added by Ranveer Pratap Singh on November 16, 2012 at 10:30pm — 8 Comments

ईश्वरल्लाह...

अजब सा शोर है…

मंदिर की घंटियों में भी

मस्ज़िद की अजानों में

मुझको रब नहीं दीखता

धर्म के इन दुकानों में



दिल में बचैनीं हैं...

क्या ख़ाक मिले सुकूं

गीता में कुरानों में

आब हूँ हवा में मिल जाऊँगा

मुझे ना दफनाना तुम

ना जलाना शमशानों में



नहीं जाता किसी दर पर...

खुदा जो है तो मुझसे मिले

कभी मेरे मकानों में

मैं मंदिर में बैठ के पियूँगा

वो तो हर जगह है

पैमानों में मयखानों में



उसे क्या ढूंढते हो तुम…

ज़िन्दगी…

Continue

Added by Ranveer Pratap Singh on November 5, 2012 at 11:30pm — 8 Comments

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