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Manan Kumar singh's Blog – November 2015 Archive (3)

गजल(मनन)

गजल

2122 2122 2122 2122

हम हुए कब से पराये अब बताना चाहिए भी,

जब हुए थे मनचले हम यह सुनाना चाहिए भी।

चुभ गयी थी चाँदनी तब ओस की इक बूँद बनकर,

हृत्-पटल तब से विखंडित कुछ जुड़ाना चाहिए भी।

खो गये हम थे बहुत उस नेह की सूनी डगर तब,

हैं कहाँ पहुँचे पता अब तो लगाना चाहिए भी।

भूलते हम जा रहे, जाना बहुत,फिर भी कहाँ तक,

रुत नयी नित हो रही कुछ तो अ-जाना चाहिए भी

बादलों-से केश काले कर रहे अठखेलियां जब,

ढक न जाये चाँद अब घूँघट हटाना चाहिए… Continue

Added by Manan Kumar singh on November 10, 2015 at 9:10am — 2 Comments

गजल(मनन)

गजल

2212 2212 2212

कुछ कुछ उठा कर कब्र से लाया गया

बिसरा हुआ संगीत सुनवाया गया ।

मतदान की होते यहाँ पर घोषणा

फिर कुंद वह हथियार चमकाया गया।

देते रहे गाली परस्पर थे बहुत

मिलकर गले उनके लिपट जाया गया।

देते रहे थे घाव अबतक तो वही

फिर से सभी जख्मों को' धुलवाया गया।

कितने अपावन हो गये जो साथ थे

जो था अपावन नेह नहलाया गया।

हम-तुम हमेशा साथ थे आगे रहें

ऐसा अभी फरमान चिपकाया गया।

घर-घर लगायी आग सब सोये रहे

संपर्क कर फिर वर्ग… Continue

Added by Manan Kumar singh on November 4, 2015 at 8:00pm — 14 Comments

गजल(मनन)

गजल

2122 2122 122

जब से'मैं बातें बनाने लगा हूँ,

मैं समझ में खूब आने लगा हूँ।

गालियाँ खायी बयाँ की हकीकत,

झूठ कह अब उनको' भाने लगा हूँ।

आरजू थी वे बुला लेते कभी,

मैं अभी उनके ठिकाने लगा हूँ।

तंग था मैं तंगदिल से निभाते,

ठाँव अब दिल में बनाने लगा हूँ।

तर्ज़ भी तब्दील होगी अभी तो,

बात से अब मैं रिझाने लगा हूँ।

गुत्थियाँ उलझी पड़ी थीं कभी की,

हौले'-से बातें बुझाने लगा हूँ।

हो रहा मैं हूँ अदीबो-मुकम्मिल,

उनके' मन का गीत गाने… Continue

Added by Manan Kumar singh on November 1, 2015 at 10:00pm — 11 Comments

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