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सुरेश कुमार 'कल्याण''s Blog (52)

कुंडलिया छंद

आग लगी आकाश में,  उबल रहा संसार।

त्राहि-त्राहि चहुँ ओर है, बरस रहे अंगार।।

बरस रहे अंगार, धरा ये तपती जाए।

जीव जगत पर मार, पड़ी जो सही न जाए।

पेड़ लगा 'कल्याण', तुझी से यह आस जगी।

हरी - हरी हो भूमि, बुझे जो यह आग लगी !

सुरेश कुमार 'कल्याण' 

मौलिक एवम् अप्रकाशित

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on May 29, 2024 at 8:00pm — 2 Comments

दीवाली

कुंडलियां*

हर घर की मुंडेर पर,
दीप जले चहुँ ओर।
दीवाली की रात है,
बाल मचाएं शोर।
बाल मचाएं शोर,
शोर ये बड़ा सुहाना।
भूलचूक सब भूल,
रहा लग गले जमाना।
खाओ रे *'कल्याण',*
मिठाई डिब्बे भर - भर।
खुशियाँ मिली अपार,
हुआ है रोशन हर घर।

*दोहा*

बढ़ें उजाले की तरफ,
हम सबके ही पांव।
इस दीवाली ना रहे,
अंधेरे में गांव।।

मौलिक एवम् अप्रकाशित
सुरेश कुमार 'कल्याण'

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on October 27, 2022 at 8:34pm — No Comments

समयानुकूल

बयालीस हैं जा चुके,बीत रहा है काल।

सुखदुख चलते साथ में,जीवन इक जंजाल।।

यारों की ये कामना,रहे सदा ही साथ।

यार सलामत हों सदा, हे नाथों के नाथ।।

उन्यासी उन्नीस सौ,माह सितंबर जान।

सोलहवीं तारीख थी, जब जन्मे 'कल्याण'।।

गुरु आभे ने लिख दई,यही जन्म तारीख।

गुरु न देते ज्ञान तो, फिरूं मांगता भीख।।

मौलिक एवम् अप्रकाशित

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on September 17, 2021 at 12:01pm — No Comments

मातृभाषा हिंदी

हिंदी हमारी मातृभाषा, हिंदी जीवन का आधार ।

हिंदी की महिमा को गाते,करते हम इसका प्रचार ।।

हिंदी के बिना जीवन सूना,हिंदी देती सबको ज्ञान ।

मन के भाव प्रकट हों सारे, पूरे करती ये अरमान ।

मातृभाषा की महिमा देखो, सुनकर होता है अभिमान ।

कोर्ट कचहरी दफ्तर सारे, बाबू कलेक्टर चौकीदार ।

हिंदी की महिमा........................................... ।

माँस से नाखून दूर ना जाएँ, कौए चलें ना हंस की चाल ।

हिंदी के सब रंग में रंग लो, अपनी…

Continue

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on September 13, 2020 at 11:30am — 3 Comments

बसंत पंचमी

माघ शुक्ल की पंचमी, कामदेव के लाल।

दोनों मिलकर आ गए, कण-कण हुआ निहाल ।।



कोयल काली कूकती, खुश हो नाचे मोर ।

माया जिसकी मोहनी,वही मदन चितचोर ।

गेंदा गुलाब ज्यों खिले,खिले गुलाबी गाल।

दोनों मिलकर-------------------।



आई बसंत पंचमी, खुशियों का आगाज ।

वाणी में रस घोलकर, गले मिलें सब आज।

सर्द रैन अब जा चुकी, हटा धुंध का जाल।

दोनों मिलकर --------------------।



ताजा-ताजा लग रहे,गिरा पुराने पात।

डाल डाल को चूमती, भूल अहं औकात… Continue

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on January 31, 2017 at 11:30am — 6 Comments

एक जलज-वीराने में

एक जलज - वीराने में

चहकता हुआ

महकता हुआ

दाग नहीं लगने दिया कभी

आब के छींटे का भी

चक्रवातों में घिरा रहा था

जिन्दगी भर।



लौट चले वो झख मारकर

धक्के खाकर थक हारकर

नाखून घिसाकर दाँत किटकिटाकर

आँधी तूफान भँवर

और

चक्रवात भी।



फिर भी लहलहाता रहा

वह वारिज

कोशिश में

अंबर को नापने की।



चुभने लगी

खुद की ही कलियाँ

शूल बनकर

सताने लगे स्व-सद्कर्म

भूल बनकर।



समझ में आया

क्या… Continue

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on December 22, 2016 at 2:30pm — 14 Comments

नशाबंदी का ढोंग

धुम्रपान

स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है

इससे कैंसर होता है

सभी जान गए हैं

मगर

क्या बीड़ी सिगरेट की फैक्ट्रियाँ

देश के लिए

दर्द निवारक हैं?

शराब का अधिक सेवन

स्वास्थ्य के लिए

हानिकारक है

इससे लीवर खराब होता है

सभी मान गए हैं

मगर

क्या मधुशालाएं

और शराब के कारखाने

देश के तारणहार हैं?

शायद

इनके बिना काम

नहीं चल सकता।

और भी बहुत सी

नशीली दवाएं व मादक

क्या केवल

टैक्स कमाने के लिए… Continue

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on November 28, 2016 at 11:02am — 16 Comments

पंख /सुरेश कुमार ' कल्याण '

पंख

---



पंख

जो

समय की मार से

हो चुके थे

जीर्ण-शीर्ण

मैंने

खूब फैलाने का प्रयास किया,

ताकि

विश्राम कर सकें

इनकी छत्रछाया में

मेरे अपने

मेरे अजीज

मेरे संबंधी।



मगर

जब वो जीर्णावस्था से

उबरे

जब पूर्ण छाया

देने ही वाले थे

चढ़ गए

मेरे

सुन्दर पंखों पर

काटने के लिए

मेरे अपने

मेरे अजीज

मेरे संबंधी।



बहुत दर्द

बहुत पीड़ा

सहने की कोशिश

बहुत… Continue

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on October 23, 2016 at 12:48pm — 10 Comments

ज़लज़ला /सुरेश कुमार ' कल्याण '

छब्बीस जनवरी

दो हजार एक

भारत का

बावनवां गणतंत्र दिवस

खुशियां थी अपार

सारी खुशियाँ

एक झटके से

बह गई ।



दिन चढ़ते ही

शुरू हुआ

विनाश का तांडव

अटारियाँ सारी

एक झटके से ढह गई ।



लील गया

हजारों जिंदगियां

लाखों घर

हुए नेस्तनाबूत।



गुजरात प्रांत

इक्कीस जिले

जलजले से

सारे हिले।

लाखों लोग

बेघर हो गए।



गांव के गांव

शहर के शहर

मिट्टी में मिल गए

जमींदोज हो… Continue

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on October 17, 2016 at 7:46pm — 4 Comments

ए वतन /सुरेश कुमार ' कल्याण '

हम भारत के शूरवीर

जाने न देंगे कश्मीर

यह सिर का ताज हमारा है

हमें प्राणों से भी प्यारा है।

ठण्डी-ठण्डी इसकी हवाएँ

झर-झर बहते इसके झरने

हृदय सी गहरी वादियां इसकी

बड़े सुन्दर हैं इसके दर्रे

अखण्ड यह भारत सारा है

यह सिर का ताज हमारा है

हमें प्राणों से भी प्यारा है।

हम हिन्दू सिक्ख या मुसलमान हैं

हम सबका वतन हिन्दुस्तान है

हिन्दू मुस्लिम का ये किस्सा

नहीं हमारी संस्कृति का हिस्सा

ऊँच-नीच और जाति-पाति

फूटी आँख हमें न… Continue

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on October 12, 2016 at 7:42pm — 3 Comments

गुरु महिमा (दोहा छन्द)/सुरेश कुमार ' कल्याण '

धन दौलत के फेर में, फैल रहा अन्धेर।

गुरु मारग पै चालिये, ना भटकेगा फेर।1।



दया धर्म अरु ज्ञान बिन, मिथ्या है अभिमान।

गुरु बिन तीनों ना मिलैं,सम हैं गुरु भगवान ।2।



दया धर्म सब व्यर्थ हैं, व्यर्थ पड़ा सब ज्ञान।

शीश झुके गुरु चरण में, मिले सन्त सुजान।3।



गुरु की राह न त्यागिये, यही गुणों की खान।

गुरु को छाड़ैं ना मिलै, कहीं प्रेम आराम।4।



गुरु बिन गति हो ज्ञान की, जैसे धनु बिन बाण।

सच्चे गुरु की ओट में, पूरे हों… Continue

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on October 8, 2016 at 4:00pm — 7 Comments

केवल एक प्रयास

अपनी मिट्टी से पैदा हुई

कपास की बाती

अपनी मिट्टी

अपने खेतों की

सरसों का तेल

अपने घर में

बिलोया गया

शुद्ध देशी घी

अपने कुम्हार के चाक पर

बना अपनी मिट्टी का

दीपक

जलना चाहिए

अपनी मिट्टी पर

अपने मान पर

अपनी मर्यादा पर

अपने शिखर पर

खासकर

अपने मन पर।

कह दो पडोसियों से

वापस ले जाएं

अपनी चमचमाती चीजें

चिरागों के मौसम में

चमकेंगे हमारे चिराग ही हमेशा

शहीदों की चिताओं पर

आँखें… Continue

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on October 7, 2016 at 10:56am — 2 Comments

मर्ज

मरीज के
मर्ज का इल्जाम
मरीज पर आ रहा है
आश्चर्य नहीं
इस दौर में
मरीज को
मरीज
खींचे जा रहा है ।
क्या
किसी की
नजर में
बीमार
बीमार है?
मगर
स्वस्थ दिखने वाले
कितने
लाचार हैं ।
जन-जन
कण-कण
समस्त पर्यावरण
कौन
किसको
दवा दे?
क्योंकि
चिकित्सक और दवाखाना
दोनों
बीमार हैं।

सुरेश कुमार ' कल्याण '
मौलिक व अप्रकाशित

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on October 6, 2016 at 9:45am — 8 Comments

भारत माता पूछ रही है (ताटंक छन्द )

कब तक सहन करूँ माथे पर, जुल्म सितम गद्दारों के।

भारत माता पूछ रही है, प्रश्न ओहदेदारों से।



लाँघी सीमा मानवता की, फिर से आग लगाई है ।

सोते वीरों पर जो गोली, तुमने आज चलाई है ।

फिर से मस्तक लाल हुआ है, कायर भीर प्रहारों से।

भारत माता पूछ----------।



हमला हुआ था संसद पर, मेरी आत्मा रोई थी ।

पठानकोट याद है सबको, कितनी जानें खोई थी।

कब तक रक्त बहेगा यूंही, राजनीतिक इशारों से।

भारत माता पूछ--------------।



उसके दिल पे क्या बीती है,…

Continue

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on September 21, 2016 at 11:30am — 8 Comments

हिंदी

हम हिन्दू हैं सिक्ख हैं या हैं मुसलमान,

लेकिन हिंदी से बना है हिन्दुस्तान।



हिंदी है एक ऐसी भाषा

जो जगाती प्यार की आशा

हिमाचल जम्मू हरियाणा

पंजाब यू पी हो या बिहार

चाहे कोई भी हो प्रान्त पर

हिंदी है हमारी शान

लेकिन हिंदी से बना है हिन्दुस्तान।



विश्व में है ये बोली जाती

कहीं पारया कहीं नैताली

फिजी में बोलते हैं फिजीबात

सरनाम में कहें सरनामी

फिजी मारिशस ट्रिनिडाड

गुयाना हो या सूरीनाम

लेकिन हिंदी से बना है… Continue

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on September 14, 2016 at 5:23pm — 4 Comments

एक संदेश : बेटियों के नाम (कुकुभ छन्द )/ सुरेश कुमार ' कल्याण '

मेरी बेटी अब तुम जागो

- - - - - - - - -



मेरी बेटी अब तुम जागो, पढ़ लिख कुछ बन दिखलाओ।

नहीं पैर की जूती औरत, दुनिया को ये बतलाओ ।



वक्त पुराना बीत चुका तू, घर की शोभा होती थी ।

झाड़ू पोंछा मार पिटाई, सिर पे बोझा ढोती थी ।

पढ़ना लिखना नहीं भाग में, अनपढ़ता में रोती थी ।

ज्ञान पुष्प बरसाकर सुन्दर, बगिया को तुम महकाओ।

मेरी बेटी अब तुम---------।



लीपा पोती चुल्हा चौका, सबको लगते हैं प्यारे।

औरत ने सदियों से बेटी, फूल खिलाए हैं… Continue

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on August 29, 2016 at 11:30am — 8 Comments

वक्त लगता है

गुस्से को शांति में बदलने

में वक्त लगता है......

अंधेरों से उजाले चमकने

में वक्त लगता है......

सब्र कर, कोशिशें अपनी

जारी रख

जंग लगे ताले को खुलने

में वक्त लगता है. ....

जब थक जाए तो रूक,

सोच, हिम्मत बुलन्द कर,

हर हार के बाद जीतने

में, वक्त लगता है. .....

फिर से महकेंगे तेरे

घर-आंगन,टूटे सपनों को जोड़,

बोल उठेगी तेरी आत्मा, टूटे को संभलने

में वक्त लगता है. ....

क्या सोच रहा भविष्य बारे,

भरोसा रख,

घटा जब… Continue

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on August 1, 2016 at 2:00pm — 6 Comments

बहती बयार को यार यूँ ही बहने दो/सुरेश कुमार ' कल्याण '

तमाशबीन नयनों को झुका रहने दो,

इन फड़कते लबों को भी कुछ कहने दो।



अगर हमसे खता कुछ हो गई,

खुद को तो तुम बेखता रहने दो।



इतने अधीर क्यों हो मिलने की खातिर,

हमें भी कुछ गम-ए-जुदाई सहने दो।



जल बिन मीन सा तड़प रहा मन,

बहती बयार को यार यूँ ही बहने दो।



चाँदनी भी है मौसम भी खुशगवार है,

मगर मन उदास है इसे उदास ही रहने दो।



जग हँस रहा है मेरी इन तन्हाइयों पर,

वहम करते हैं लोग इन्हें वहमी ही रहने दो।



मेरे खाक… Continue

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on July 4, 2016 at 10:21am — 6 Comments

एक सिपाही की इच्छा

मेरी मौत पर आंसू न बहाना तुम,

मैं शहीद हूँगा इस देश की खातिर,

मेरी मौत पर एक जश्न मनाना तुम।



जिस मिट्टी में जन्म लिया,

इसकी रेत में खेलकर बड़े हुए,

पैरों से रौंदा जिसको मैंने,

अन्न खाया है जिस मिट्टी का,

मर जाऊं गर इस मिट्टी की खातिर,

मेरी मौत पर एक जश्न मनाना तुम ।



गर गिरें तुम्हारी आंखों से आंसू उस घड़ी,

मेरी तमन्ना है वो खुशी के आंसू हों,

इस पवित्र मिट्टी में समाते हुए,

मेरा कफन हरी वर्दी या तिरंगे का हो,

प्राण जाएं… Continue

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on June 28, 2016 at 6:41pm — No Comments

कविता

एक पथिक से मैंने पूछा

किस बला का नाम कविता।

खुद इतराकर बोली कविता

सबके मन में बसी कविता।

जो तेरे अन्दर बोल रही

कोमलता का नाम कविता।

तेरे मुखमंडल पर छाई

हंसी खुशी का नाम कविता।

झील कविता पहाड़ कविता

शेरों की चिंघाड़ कविता।

कांटे कविता फूल कविता

पवन कविता धूल कविता।

सृष्टि की जड़ मूल कविता

जीवन के उसूल कविता।

छांव कविता धूप कविता

ज्ञान अज्ञान का सूप कविता।

स्नेह कविता अभिमान कविता

प्यार का है नाम… Continue

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on June 21, 2016 at 5:05pm — 2 Comments

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