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Ravi Prakash's Blog (43)

मेरी कविते ! (रवि प्रकाश)

चाँद नगर को जाते-जाते,जिनका अश्व भटकता है;

उडुगण की उजली बस्ती में,चुँधियाया सा रुकता है।

स्वर्णकिरण की राहों पर जो,चलते हुए झिझकते हैं;

जिनके स्वप्न जहाँ विस्फारित,होते वहीं पिघलते हैं।

नीरदमाला बन कर उनके,निःश्वासों में गलना है।

मेरी कविते! साथी हो कर,हमको दूर निकलना है॥

जग में चौराहे कितने हैं,कितनी परम्पराएँ भी;

बनती-मिटती बस्ती भी है,अडिग अट्टालिकाएँ भी।

जीवन भर दोराहे पर जो,पथ-निर्धारण करते हैं;

आशा की कच्ची गागर में,सदा हताशा भरते हैं।…

Continue

Added by Ravi Prakash on July 18, 2013 at 7:00am — 8 Comments

कितना तुमको जीना है //रवि प्रकाश (Kitna Tumko Jeena Hai By Ravi Prakash)

सदियाँ बीत गई हैं फिर भी,जीने का आधार नहीं;

धड़कन लीक बदलती है पर,सांसों में आभार वही।

गरमी के खेमे उठ जाते,अगले पल में रिमझिम है;

जग के झूठे व्यापारों में,परिवर्तन ही अन्तिम है।

दुख की दीवारें पक्की हैं,सुख का परदा झीना है।

अपने में ही सब कुछ हो कर,कितना तुमको जीना है॥

सागर होना बहुत सरल है,नदिया बन गाना मुश्किल;

शिखरों सा उठना संभव है,गल कर बह जाना मुश्किल।

छाले भी सहलाने होंगे,गिरती-पड़ती राहें हैं;

सुर में गा पाना बहुत कठिन,स्वर में तपती आहें… Continue

Added by Ravi Prakash on July 16, 2013 at 6:00am — 14 Comments

गंगे ! (रवि प्रकाश)

माँ वो है-

जो जन कर जुड़ जाती है

चेतना के अंधकूपों में भी

अपने जने का करती है पीछा,

एक सूत्र बन कर संतति से हो जाती है तदाकार,

पालना ही जिसका

सार्वत्रिक,सार्वभौमिक और शाश्वत संस्कार;

शायद इसीलिए हमारे

उन दिग्विजयी पड़दादाओं ने

तेरे कगारों पर दण्डवत कर के

उर्मिल जल की

अँजुरी भर के

कोई संकल्प किया था

और बुदबुदाये थे कितने ही मंत्र अनायास

तुझे माँ कह कर।

वो शायद आदिम थे

इसीलिए भ्रमित थे,असभ्य थे

और हम सभ्य…

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Added by Ravi Prakash on July 13, 2013 at 5:30pm — 10 Comments

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