For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s Blog (508)

जाते साल के दोहे

आने  वाले  साल   से,  कहे  बीतता  वर्ष
मुझ सा दुख मत बाँटना, देना केवल हर्ष।।
*
वर्ग भेद जग से मिटा, मिटा जाति संधर्ष
कर देना कर थामकर, निर्धन का उत्कर्ष।।
*
पहले सा परमार्थ भी, वह फिर गुणे सहर्ष
स्वार्थ साधना ही न हो, सत्ता का निष्कर्ष।।
*
घर आँगन है जो बसा, झाड़ पोंछ सब कर्ष
भर   देना  सौहार्द्र  से, अब  के   भारतवर्ष।।

मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी "मुसाफिर'

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 30, 2021 at 7:30am — No Comments

दोहा सप्तक -५ ( लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' )

सूरज यूँ है गाँव में, बहुत अधिक अँधियार।

नगर-नगर ही कर रही, किरणें हर व्यापार।।१

*

बन जाती है देश  में, जिस की भी सरकार।

जूती सीधी कर रहे, नित उस की अखबार।।२

*

कैसे ये बस्ती जली, क्यों उजड़ा बाजार।

किस से पूछें बोलिए, जगी नहीं सरकार।।३

*

गमलों में  फसलें  उगा, खेतों  में हथियार।

इसी सोच से क्या सुखी, होगा यह संसार।।४

*

कोई जब हो छीनता, थोड़ा भी अधिकार।

आँखों से आँसू  नहीं, निकलें  बस अंगार।।५

*

बातें व्यर्थ सुकून की,…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 26, 2021 at 6:02am — 6 Comments

दोहा सप्तक -४ (लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर')

लेता है भुजपाश में, बढ़चढ़ ज्यू ही काम।

एक हवेली प्यार  की, होती नित नीलाम।।१

*

कर लो ढब ऐश्वर्य  को, चाहे  इस के नाम।

दुधली की दुधली रहे, हर जीवन की शाम।।२

*

सिलता रहा जुबान जो, बढ़चढ़ यहाँ निजाम।

शब्दों ने झर आँख से, किया कहन का काम।।३

*

निर्धन को जिसने दिये, हरदम कम ही दाम।

धनी उसे  ठग  ले  गया, पैसा  नित्य तमाम।।४

*

रमे  यहाँ  व्यापार में , सब  ले  उसका नाम।

महज भक्ति के भाव से, किसको प्यारे…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 23, 2021 at 10:00am — 4 Comments

दोहा सप्तक-३

लघु से लघुतम बात को, जो देते हैं तूल।

ये तो निश्चित जानिए, मन में उनके शूल।१।

*

बनते बाल दबंग अब, पढ़ना लिखना भूल।

हुए नहीं क्यों सभ्य वो, जाकर नित स्कूल।२।

*

करती मैला भाल है, मद में उठकर धूल।

करे शिला को ईश यूँ, न्योछावर हो फूल।३।

*

साक्ष्य समय विपरीत पर, तजे सत्य ना मूल।

ज्यों नद सूखी  पर  हुए, एक  नहीं  दो कूल।४।

*

जलने को पथ काल का, तकना होगी भूल।

हवा कभी  होती  नहीं, सुनो  दीप अनुकूल।५।

*

कड़वी बातें तीर सी,…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 20, 2021 at 10:28pm — 8 Comments

दोहा सप्तक -२

राजनीति के पेड़  से, लिपटे  बहुत भुजंग।

जिनके विष से हो गये, सब आदर्श अपंग।१।

*

बँधकर पक्की डोर से, छूना नहीं अनंग।

सबके मन की चाह है, होना कटी पतंग।२।

*

शिव सा बना न आचरण, होते गये अनंग।

लील रहे  जीवन  तभी, ओछे  प्रेम प्रसंग।३।

*

क्षीण,हीन उल्लास अब, शेष न कोई ढंग।

हालातों ने कर दिया, जीवन अन्ध सुरंग।४।

*

बेढब फीके  हो  गये, जब  से जीवन रंग।

कितनों ने है कर लिया, अपनी साँसें भंग।५।

*

तन की गलियाँ बढ़ गयीं, मन का आँगन…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 16, 2021 at 2:26pm — 4 Comments

दोहा सप्तक -१

धनी बसे परदेश में, जनधन सदा समेट।

ढकते निर्धन  लोग यूँ, यहाँ  पाँव से पेट।१।

*

कीचड़ में जब हैं सने, पाँव तलक हम दीन।

राजन  के  प्रासाद  का, क्या  देखें कालीन।२।

*

नेताओं की हर सभा, फिरे बजाती आज।

यूँ जनता है झुनझुना, भले वोट का नाज।३।

*

ऊँचे  आलीशान   हैं,  नेताओं  के  गेह।

दुहरी जिनके बोझ से, हुई देश की देह।४।

*

गूँगे बहरे लोग  जब, भरे  पड़े इस देश।

कैसे बदले बोलिए, अपना यह परिवेश।५।

*

सुख के दिन दोगे बहुत,…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 15, 2021 at 4:30am — 8 Comments

हमें लगता है हर मन में अगन जलने लगी है अब

१२२२/१२२२/१२२२/१२२२



बजेगा भोर का इक दिन गजर आहिस्ता आहिस्ता 

सियासत ये भी बदलेगी मगर आहिस्ता आहिस्ता/१

*

सघन  बादल  शिखर  ऊँचे  इन्हें  घेरे  हुए  हैं पर

उगेगी घाटियों  में  भी  सहर आहिस्ता आहिस्ता/२

*

हमें लगता है हर मन में अगन जलने लगी है अब

तपिस आने लगी है जो इधर आहिस्ता आहिस्ता/३

*

हमीं  कम  हौसले  वाले  पड़े  हैं  घाटियों  में  यूँ

चढ़े दिव्यांग वाले भी शिखर आहिस्ता आहिस्ता/४

*

अभी…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 8, 2021 at 6:30am — 8 Comments

दूर तम में बैठकर वो रोशनी अच्छी लगी- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२२/२१२२/२१२२/२१२



मन था सुन्दर तो वदन की हर कमी अच्छी लगी

उस के अधरों  ने  कही  जो  शायरी  अच्छी लगी/१

*

सात जन्मों  के  लिए  वो  बन्धनों  में बँध गये

जिन्दगी के बाद जिनको जिन्दगी अच्छी लगी/२

*

आँख चुँधियाती रही जो पास में अपनी सनम

दूर  तम  में  बैठकर  वो  रोशनी  अच्छी  लगी/३

*

एक  हम  ही  भागते  रंगीनियों  से  दूर  नित

और किसको बोलिए तो सादगी अच्छी लगी/४

*

हाथ में था हाथ उनका दूर तक कोई न…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 3, 2021 at 7:32pm — 8 Comments

जिसकी आदत है घाव देने की - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२२ १२१२ २२

बल रहित मैं हूँ  भीम कहता है

तुच्छ खुद को असीम कहता है/१

*

जिसकी आदत है घाव देने की

वो स्वयम को हकीम कहता है/२

*

आम पीपल  को  भूल बैठा वो

और कीकर को नीम कहता है/३

*

राम से जो गुरेज उस को नित

क्यों तू खुद को रहीम कहता है/४

*

धर्म क्या है समझ  न पाया जो

धर्म को  वो  अफीम  कहता है/५

*

हाथ जिसका है कत्ल में या रब

वो भी खुद को नदीम कहता…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 29, 2021 at 10:04pm — 4 Comments

क्यों कर हसीन ख्वाब की बस्ती मिटा दूँ मैं- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२



कैसे किसी की याद में सब कुछ भुला दूँ मैं

क्यों कर हसीन ख्वाब की बस्ती मिटा दूँ मैं/१

*

बचपन में जिसने आँखों को आँसू नहीं दिया 

क्योंकर जवानी जोश  में  उस को रुला दूँ मैं/२

*

शायद कहीं  पे  भूल  से वादा  गया मैं भूल

जिससे लिखा है न्याय में खुद को दगा दूँ मैं/३

*

घर में उजाला  मेरे  भी  आयेगा डर यही

पथ में किसी के दीप तो यारो जला दूँ मैं/४

*

अपना पराया भेद  वो  भूलेगा इस से क्या

उसकी जमीं में अपनी भी…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 27, 2021 at 11:14pm — 2 Comments

हुई कागजों में पूरी यूँ तो नीर की जरूरत - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

११२१/२१२२/११२१/२१२२



भरें खूब घर स्वयं के सदा देशभर को छल के

मिले सारे अगुआ क्योंकर यहाँ सूरतें बदल के/१

*

गिरी  राजनीति  ऐसी  मेरे  देश  में  निरन्तर

कोई जेल से लड़ा तो कोई जेल से निकल के/२

*

मिटा भाईचारा अब तो बँटे सारे मजहबों में

सही बात हैं समझते कहाँ लोग आजकल के/३

*

हुई कागजों में  पूरी  यूँ  तो  नीर की जरूरत

चहुँ ओर किन्तु दिखते हमें सिर्फ सूखे नल के/४

*

कई दौर गुफ्तगू के किये हल को हर समस्या

नहीं आया कोई रस्ता कभी…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 25, 2021 at 11:22pm — 2 Comments

शठ लोग अब पहनकर चोला ये गेरुआ सा - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२२/२२१/२१२२



हँसना सिखाया हमने आँखों के आँसुओं को

सम्बल दिया है हरपल  कमजोर बाजुओं को।१।

*

कहती है रूह उन  की  बलिदान जो हुए थे

पहचान कर  हटाओ  जयचन्द पहरुओं को।२।

*

शठ लोग अब पहनकर चोला ये गेरुआ सा

करने लगे हैं निशिदिन बदनाम साधुओं को।३।

*

उनको तमस भला क्यों जायेगा ऐसे तजकर

बैठे जो बन्द कर के  दिन  में भी चक्षुओं को।४।

*

कैसे वसन्त आये पतझड़ को रौंद के फिर

हर डाल…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 26, 2021 at 10:19pm — 14 Comments

कैसे कैसे लोग यहाँ -(गजल)-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२२२/२२२२/२२२२/२२२



छीन के उनका पूरा बचपन कैसे कैसे लोग यहाँ

काट रहे हैं  अपना  जीवन  कैसे कैसे लोग यहाँ।२।

*

पाने को यूँ नित्य शिखर को साथी देखो दौड़े जो

कर बैठे औरों  को  साधन  कैसे  कैसे लोग यहाँ।२।

*

स्वार्थ सधे तो अपनों से भी झूठ छिपाने साथी यूँ

कीचड़ को कह  देते  चन्दन कैसे कैसे लोग यहाँ।३।

*

साध न पाये यार सियासत उस खुन्नस में देखो तो

बाँट रहे हैं मन का …

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 3, 2021 at 6:30am — 12 Comments

स्वयं को तनिक एक बच्चा बना-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

१२२/१२२/१२२/१२



न दे साथ जग  तो अकेला बना

नया अपने दम पर जमाना बना।१।

*

थका हूँ जतन कर यहाँ मैं बहुत

कि घर मेरा तू ही शिवाला बना।२।

*

तुझे अपना कहते बितायी सदी

न  ऐसे तो पल  में  पराया बना।३।

*

यहाँ सच की बातें तो अपराध हैं

यही सोच खुद को न झूठा बना।४।

*

बड़ों के दिलों में भरा दोष अब

स्वयं को तनिक एक बच्चा बना।५।

*

बहुत दम है साथी कहन में मगर

नहीं अपने…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 27, 2021 at 6:45am — 7 Comments

ओजोन दिवस के दोहे

परत घटे ओजोन की, बढ़े धरा का ताप

काटे हम ने पेड़ जो, बने वही अभिशाप।१।

*

छन्नी सा  ओजोन  ही,  छान  रही  है धूप

घातक किरणें रोक जो, करती सुंदर रूप।२।

*

गोला सूरज आग का, विकिरण से भरपूर

पराबैंगनी  ज्वाल  को, ओजोन  रखे  दूर।३।

*

जीवन है ओजोन से, करो न इस को नष्ट

बिन इसके धरती सहित होगा सबको कष्ट।४।

*

क्लोरोफ्लोरोकार्बन,  है जिन की सन्तान

एसी फ्रिज ये उर्वरक, दें उसको नुकसान।५।

*

कर इनका उपयोग कम, करना अच्छा काम…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 15, 2021 at 5:30pm — 4 Comments

निज भाषा को जग कहे (दोहा गजल) - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

निज भाषा को जग कहे, जीवन की पहचान

मिले नहीं इसके बिना, जन जन को सम्मान।१।

*

बड़ा सरल पढ़ना जिसे, लिखना भी आसान

पुरखों से हम को मिला, हिन्दी का वरदान।२।

*

हिन्दी के प्रासाद का, वैज्ञानिक आधार

तभी बनी है आज ये, भाषा एक महान।३।

*

जैसे  धागा  प्रेम  का, बाँध  रखे  परिवार

उत्तर से दक्षिण तलक, एका की पहचान।४।

*

नियमों में बँधकर रहे, हिन्दी का हर रूप

भाषाओं में हो गयी, इस से यह विज्ञान।५।

*

गूँजे चाहे विश्व  में, हिन्दी  कितना…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 13, 2021 at 11:08pm — 3 Comments

एक दोहा गज़ल - प्रीत - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर'

एक दोहा गज़ल - प्रीत -(प्रथम प्रयास )

छूट गयी जब  से  यहाँ, सहज  प्रेम की रीत

आती तन की वासना, बनकर मन का मीत।१।

*

चलते फिरते तन करे, जब  तन से मनुहार

मन को तब झूठी लगे, मन की सच्ची प्रीत।२।

*

एक समय जब स्नेह में, जाते थे जग हार

आज सुवासित वासना, चाहे केवल जीत।३।

*

भरे सदा ही  प्रीत ने, ताजे तन मन घाव

प्रेम रहित जो हो गये, खोले घाव अतीत।४।

*

मण्डी जब  से  देह को, कर  बैठे हैं लोग

मन से मन के मध्य में, आ पसरी है…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 13, 2021 at 11:25am — 6 Comments

चर्चा प्रलय की करती हैं धर्मों की पुस्तकें -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२२१/२१२१/१२२१/२१२



नफरत ने जो दिया वो मुहब्बत न दे सकी

हमको सफलता  यार  इनायत न दे सकी।१।

*

चर्चा प्रलय की करती हैं धर्मों की पुस्तकें

पापों को किन्तु अन्त कयामत न दे सकी।२।

*

बूढ़े हुए  हैं  लोग  जो  चाहत  में  स्वर्ग के

कह दो उन्हें कि मौत भी जन्नत न दे सकी।३।

*

सोचा था एक हम ही हैं इसके सताये पर

सुनते खुशी उन्हें  भी  सराफत न दे सकी।४।

*

जो बन के सीढ़ी  खप  गये सत्ता के वास्ते

उनको कफन भी यार सियासत न दे सकी।५।

*

चाहे…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 10, 2021 at 8:39pm — 3 Comments

किये कैद बैठा हवाओं को जो भी - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

१२२/१२२/१२२/१२२



चिढ़ा मौत से पर हँसा जिन्दगी पर

अँधेरों से डर कर  चढ़ा रौशनी पर।१।

*

किये कैद बैठा हवाओं को जो भी

बहस कर रहा है वही ताजगी पर।२।

*

बना सन्त बैठा मगर है फिसलता

कभी मेनका पर कभी उर्वशी पर।२।

*

खड़े  देवता  हैं  सभी  कठघरे में

करो चर्चा थोड़ी कभी बंदगी पर।४।

*

सभी खीझते हैं जले दीप पर तो

उठा क्रोध यारो कहाँ तीरगी पर।५।

*

अजब देवता जो डरे आदमी से

हुआ द्वंद भारी यहाँ…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 9, 2021 at 9:45pm — 8 Comments

पर्व गुरुओं का मनाते आज हम -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२१२२/२१२२/२१२



पर्व गुरुओं  का  मनाते आज हम

और मन के पास आते आज हम।१।

*

पुष्प भावों के  चढ़ाते आज हम 

शीष श्रद्धा से झुकाते आज हम।२।

*

है मिला हर ज्ञान उन से ही हमें

मान उनको दे जताते आज हम।३।

*

सीख उनकी आचरण में ढालकर

कर्ज किंचित यूँ चुकाते आज हम।४।

*

आब भर कर है सितारों सा किया

हर चमक उन से, बताते आज हम।५।

*

ज्ञान दाता  बढ़  बिधाता  से हैं तो

यश उन्हीं…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 4, 2021 at 1:35pm — 13 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन ।फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
1 hour ago
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212  22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत में क्या से क्या हो गए महब्बत में मैं…"
4 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ
"  आपका हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’ जी   "
7 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा एकादश. . . . . पतंग
"आदरणीय सुशील सरनाजी, पतंग को लगायत दोहावलि के लिए हार्दिक बधाई  सुघड़ हाथ में डोर तो,…"
7 hours ago
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय रवि भसीन 'शहीद' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला ग़ज़ल तक आए और हौसला…"
10 hours ago
Sushil Sarna posted blog posts
yesterday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय Jaihind Raipuri जी,  अच्छी ग़ज़ल हुई। बधाई स्वीकार करें। /आयी तन्हाई शब ए…"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on रामबली गुप्ता's blog post कर्मवीर
"कर्मवीरों के ऊपर आपकी छांदसिक अभिव्यक्ति का स्वागत है, आदरणीय रामबली गुप्त जी.  मनहरण…"
yesterday
Jaihind Raipuri posted a blog post

ग़ज़ल

2122    1212    22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत मेंक्या से क्या हो गए महब्बत में मैं ख़यालों में आ गया उस…See More
yesterday
Jaihind Raipuri commented on Admin's group आंचलिक साहित्य
"कुंडलिया छत्तीसगढ़ी छत्तीसगढ़ी ह भाखा, सरल ऐकर बिधान सहजता से बोल सके, लइका अऊ सियान लइका अऊ…"
yesterday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . रिश्ते
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय "
Monday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

तब मनुज देवता हो गया जान लो,- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२/२१२/२१२/२१२**अर्थ जो प्रेम का पढ़ सके आदमीएक उन्नत समय गढ़ सके आदमी।१।*आदमीयत जहाँ खूब महफूज होएक…See More
Monday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service