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दो क्षणिकाएँ (गणेश जी बाग़ी)

दो क्षणिकाएँ
========
(1) थप्पड़

मुझे पता भी न था
उस शब्द का अर्थ
गुस्से में किसी को बोल दिया था
'साला....'
गाल पर झन्नाटेदार थप्पड़ के साथ
माँ ने समझाया था
गाली देना गंदी बात !

काश,
उनकी माँ ने भी
लगाया होता
थप्पड़
तो आज...
नहीं देते वे
माँ, बहन को इंगित
गालियाँ ।

(2) बारुद

उनको दिखाई देता है
बारूद
मेरी दीया-सलाई की काठी में,
जिससे जलता है
हमारे घर का चूल्हा
जिसपर रख तवा
माँ सेकती है
रोटियाँ
और बुझाती है
आग
हमारे पेट की ।

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by MUKESH SRIVASTAVA on February 15, 2020 at 5:35pm

achee rachnaa mitra - badhaae

Comment by TEJ VEER SINGH on February 15, 2020 at 12:14pm

हार्दिक बधाई आदरणीय गणेश जी बागी जी। बेहतरीन क्षणिकांएँ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 11, 2020 at 11:51am

आ. भाई गणेश जी बागी, सादर अभिवादन । अच्छी क्षणिकाएँ हुई हैं । हार्दिक बधाई ।

Comment by Samar kabeer on February 8, 2020 at 3:11pm

जनाब गणेश जी 'बाग़ी' साहिब आदाब, अच्छी क्षणिकाएँ लिखीं आपने, इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by नाथ सोनांचली on February 6, 2020 at 5:07am

आद0 गणेश जी बागी जी सादर अभिवादन। बेहतरीन भावपरक और भावनाओं के समुद्र में एक कश्मकश पैदा करती दोनों क्षणिकाएं के लिए बधाई स्वीकार कीजिये

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