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आग में जलना नहीं आया.- ग़ज़ल

 मापनी १२२२ १२२२ १२२२ १२२२ 

कभी रुकना नहीं आया कभी चलना नहीं आया. 

हमें हर एक साँचें में कभी ढलना नहीं आया. 

बहारों में ये सहरा भी गुलिस्ताँ बन गया होता,

किसी दरिया समंदर को उसे छलना नहीं आया. 

जो बाहर ख़ूब  फूले हैं फले हैं पेड़ आमों के,

मेरे आँगन में उनको फूलना फलना नहीं आया.

जड़ें मज़बूत करने में हमारी ज़िंदगी बीती, 

अमरबेलों के जैसे पेड़ पर पलना नहीं आया.

 

मुकम्मल इश्क़ की उससे मुझे उम्मीद क्या होती, 

जिसे दो पल विरह की आग में जलना नहीं आया.

"मौलिक एवं अप्रकाशित "

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Comment by बसंत कुमार शर्मा on July 21, 2020 at 8:32pm

आदरणीय सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप'  जी सादर नमस्कार 

आपकी मनभावन प्रतिक्रिया पाकर अभिभूत हूँ , सादर नमन 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on July 21, 2020 at 8:32pm

आदरणीय  सालिक गणवीर जी सादर नमस्कार 

आपकी मनभावन प्रतिक्रिया पाकर अभिभूत हूँ , सादर नमन 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on July 21, 2020 at 8:31pm

आदरणीय  Rupam kumar -'मीत' जी सादर नमस्कार 

आपकी मनभावन प्रतिक्रिया पाकर अभिभूत हूँ , सादर नमन 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on July 21, 2020 at 8:31pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी सादर नमस्कार 

आपकी हौसला अफजाई के लिए दिल से शुक्रिया 

Comment by नाथ सोनांचली on July 18, 2020 at 4:38pm

आद0 बसन्त कुमार शर्मा जी सादर अभिवादन। एक उम्दा ग़ज़ल पर मेरी कोटिश शुभकामनाएं निवेदित है। सादर

Comment by सालिक गणवीर on July 18, 2020 at 9:32am

भाई बसंत कुमार शर्मा जी.

सादर अभिवादन

एक उम्दा ग़जल और  ख़ास तौर पर चौथे शैर पर दाद और मुबारकबाद क़ुबूल कीजिए.

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 16, 2020 at 9:01pm

आ. भाई बसंत जी, सादर अभिवादन । अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बवाई ।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on July 16, 2020 at 5:58pm

आदरणीय अमीरुद्दीन 'अमीर' जी सादर नमस्कार, आपकी हौसलाअफजाई से अभिभूत हूँ , आपने जो इस्लाह की है उसके अनुसार सुधार कर लेता हूँ , सादर नमन 

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on July 16, 2020 at 12:39am

जनाब बसंत कुमार शर्मा जी आदाब, अच्छी ग़ज़ल हुई है बधाई स्वीकार करें। कुछ टंकण त्रुटियों की ओर आपका ध्यानाकर्षण कराना चाहूँगा : हमें औरों के साँचें में कभी ढलना नहीं आया. इस मिसरे में औरों बहुवचन है इसलिए साँचें को साँचों कर लीजिए,

"बहारों में ये सेहरा भी गुलिस्तां बन गया होता,  इस मिसरे में आया शब्द सेहरा ठीक नहीं है सहीह शब्द 'सहरा' यानि रेगिस्तान है, गुलिस्तां में चन्द्र बिन्दु होना चाहिए। उर्दू के शब्दों 'खूब', 'मजबूत' और 'जिन्दगी' में ख और ज पर नुक़्ता लगा लें। सादर। 

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