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रघुनाथ ..ग़ज़ल 2122—1122—1122—22

2122—1122—1122—22

रूठ मत जाना कभी दीन दयाला मुझसे

रखना रघुनाथ हमेशा यही नाता मुझसे

 

हर मनोरथ हुआ है सिद्ध कृपा से तेरी

तू न होता तो हर इक काम बिगड़ता मुझसे

 

नाव तुमने लगा दी पार वगरना रघुवर

इस भँवर में था बड़ी दूर किनारा मुझसे

 

जैसे शबरी से अहिल्या से निभाया राघव

भक्तवत्सल सदा यूँ प्रेम निभाना मुझसे

 

एक विश्वास तुम्हारा है मुझे रघुनंदन

दूर जाना न कोई करके बहाना मुझसे

 

जानकी नाथ कृपा आप बनाए रखना

नाथ नाराज रहे लाख ज़माना मुझसे

 

आपके नूर से रोशन है यहाँ हर ज़र्रा

हूं तो ‘खुरशीद’ मगर होता उजाला मुझसे ?

 

मौलिक व अप्रकाशित    

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Comment by Harash Mahajan on January 8, 2016 at 1:32pm

नाव तुमने लगा दी पार वगरना रघुवर

इस भँवर में था बड़ी दूर किनारा मुझसे

 

जैसे शबरी से अहिल्या से निभाया राघव

भक्तवत्सल सदा यूँ प्रेम निभाना मुझसे

वाह बहुत खूब आदरणीय खुर्शीद  जी बेहद उम्दा  शब्द.....बधाई हो !

Comment by Shyam Mathpal on March 31, 2015 at 8:25pm

 आ० खुर्शीद जी, 

Bahut hi sundar rachna hai.Har shabd dil ko chuta hai. Hardik badhi.

  

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 31, 2015 at 5:21pm
नाव तुमने लगा दी पार वगरना रघुवर

इस भँवर में था बड़ी दूर किनारा मुझसे



जैसे शबरी से अहिल्या से निभाया राघव

भक्तवत्सल सदा यूँ प्रेम निभाना मुझसे


इस बेहतरीन यादगार गजल पर आपको अभिनन्दन खुर्शीद सर!
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 31, 2015 at 6:01am

आ0 भाई खुर्शीद जी , बेहतरीन और उम्दा ग़ज़ल हुई है । शेर दर शेर दाद कुबूल फरमाए ।

Comment by Hari Prakash Dubey on March 30, 2015 at 7:50pm

आदरणीय खुर्शीद भाई , बहुत बहुत बधाई आपको इस सुन्दर रचना पर ! सादर 

Comment by Samar kabeer on March 30, 2015 at 11:35am
जनाब खुर्शीद जी,आदाब,हम्द के अच्छे शैर निकाले हैं,यह भी आपका हुनर है कि आप ग़ज़ल के अलावा दूसरी असनाफ़ पर भी तबअ आज़माई करते हैं,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं |
Comment by Nilesh Shevgaonkar on March 30, 2015 at 10:49am

बहुत खूब ...इस ख़ास ग़ज़ल के लिए बधाईयाँ 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on March 29, 2015 at 9:18pm
आदरणीय खुर्शीद सर, बेहतरीन और उम्दा ग़ज़ल हुई है। शेर दर शेर दाद कुबूल फरमाए। आपकी ग़ज़ल हमेशा विशिष्ट होती है।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 29, 2015 at 5:48pm

आ० खुर्शीद जी

बेहतरीन गजल .

जैसे शबरी से अहिल्या से निभाया राघव

भक्तवत्सल सदा यूँ प्रेम निभाना मुझसे-----  इस शेर में कुछ और समय अपेक्षित था शायद . सादर .

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