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दोहा त्रयी. . . . . .राजनीति

दोहा त्रयी : राजनीति

जलकुंभी सी फैलती, अनाचार  की बेल ।
बड़े गूढ़ हैं क्या कहें, राजनीति के खेल ।।

आश्वासन के फल लगे, भाषण की है बेल ।
राजनीति के खेल की , बड़ी अज़ब है रेल ।।

राजनीति के खेल की, छुक- छुक करती रेल।
डिब्बे बदलें पटरियां, नेता खेलें खेल ।।

सुशील सरना / 23-1-22

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment by Saurabh Pandey on February 6, 2022 at 9:06am

अच्छा प्रयास हुआ है, आदरणीय. 

जय-जय 

Comment by Sushil Sarna on January 31, 2022 at 1:34pm
आदरणीय अमीरुद्दीन साहिब, आदाब - स्थिति स्पष्ट करने के लिए हार्दिक आभार
Comment by Chetan Prakash on January 31, 2022 at 4:17am

आ. अमीर साहब, इस तरह की आधारहीन टिप्पणी करना आपकी कदाचित आदत बन गयी है! अभी सम्पन्न मुशायरे में भी आप मुझे ज्ञान दे रहे थे कि " ग़ज़ल "उर्दू की विधा है! " और, जब मैं ने बताया कि उर्दू मूलतः भारत में विकसित हिन्दी

की बोली है जिसे पहले हिन्दुस्तानी, हिन्दवी और तत्पश्चात उर्दू कहा जाने लगा तो आप ने मुझे मंच पर असत्य भाषण का आरोप लगाते हुए चेतावनी जारी कर दी! इतना ही नहीं ग़ज़ल उर्दू की विधा यह झूठ और बोला बिना यह समझे हुए कि कोई भी विधा किसी भाषा विशेष की मोहताज नहीं होती! 

के लिए चेतावनी देते हुए मेरे प्रोफेसर होने पर व्यंग किया है! 

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on January 30, 2022 at 10:51pm

आदरणीय सुशील सरना जी आदाब, क्षमा पूर्वक निवेदित है कि मैंने त्रुटिवश दोहे के चरण "बड़ी अज़ब है रेल" का प्रारम्भ 'जगण' से होना मानकर टिप्पणी की थी। वास्तव में उक्त चरण दोष रहित है। 'जगण' तीन अक्षरों का ऐसा समूह (शब्द) जिसका पहला अक्षर लघु दूसरा दीर्घ तथा तीसरा लघु हो, जैसे रमेश, गरीब, अजीब, मशीन, किसान आदि हो, को कहते हैं। मेरे द्वारा इंगित चरण में दो अलग-अलग शब्दों के अक्षरों को मिला कर त्रुटिवश जगण मानकर टिप्पणी की गयी जो कि ग़लत है। पुन: क्षमा सहित।  सादर। 

Comment by Sushil Sarna on January 30, 2022 at 4:43pm
आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय ।
Comment by Sushil Sarna on January 30, 2022 at 4:43pm
आदरणीय अमीरुद्दीन साहिब, आदाब - सृजन के भावों को मान एवं सुझाव के लिए दिल से आभार । सहमत एवं भविष्य के लिए अवगत हुआ सर ।
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 29, 2022 at 12:44pm

आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। सुन्दर दोहावली हुई है । हार्दिक बधाई।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on January 25, 2022 at 8:22pm

आदरणीय सुशील सरना जी आदाब, तुच्छ राजनीति पर कटाक्ष करते सुंदर दोहे रचे हैं आपने, हार्दिक बधाई।

'बड़ी अज़ब है रेल'   दोहे में चरणों का प्रारम्भ जगण से होने का निषेध है, 'अजब' शब्द में नुक़्ता नहीं लगेगा, सादर। 

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