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दीनो धरम,ईमान के हाइल हैं यहाँ पर|
मैं इल्म किसे दूँ,सभी जाहिल हैं यहाँ पर|

.
नादान बशर रो रहा जिस शख्स के आगे,
वह शख्स कहीं और है,गाफिल है यहाँ पर

.

मैं अपना सारा जोर अमल में हूँ ला रहा,
कुछ बात है जो सिफ़र ही हासिल है यहाँ पर|

.
साकी उसूल तेरा तिजारत है मयकदा,
मयख्वार मेरे वास्ते कामिल हैं यहाँ पर|

.
आतिश है,कफस,आशियां है,बाग है,बुलबुल,
सब एक दूसरे के मुक़ाबिल है यहाँ पर|

.
अंदर से टूटे लोगों की जमात है दुनिया|
बस कहने के ही वास्ते महफ़िल है यहाँ पर|

.
तू डर रहा मयंक क्यों पैगामे अजल से,
जल्लाद है आलम,सभी कातिल हैं यहाँ पर|

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 16, 2012 at 10:51am

भाई मनोज जी, आपकी इस गंभीर प्रस्तुति को मरी बधाई.

मैं अपना सारा जोर अमल में हूँ ला रहा,
कुछ बात है जो सिफ़र ही हासिल है यहाँ पर|

बहुत अच्छे.. .

Comment by Sarita Sinha on April 15, 2012 at 11:36pm

बहुत खुबसूरत ग़ज़ल मनोज जी, 

सारी तारीफ नीचे हो चुकी है, बेहतर है कि मैं कुछ न कह कर सिर्फ पढ़ने का आनंद उठाऊँ ....
हाँ एक कमी है, बहुत जल्दी ख़त्म हो गयी....
Comment by मनोज कुमार सिंह 'मयंक' on April 5, 2012 at 9:56pm

आदरणीय हबीब भाई...

मनोबल बढ़ाने वाली उत्साहजनक टिप्पडी हेतु हार्दिक बधाई....सादर वंदे

Comment by Sanjay Mishra 'Habib' on April 5, 2012 at 2:59pm

वाह! वाह! बहुत सुन्दर ग़ज़ल मयंक भाई...

हार्दिक बधाई स्वीकारें.

Comment by मनोज कुमार सिंह 'मयंक' on April 3, 2012 at 10:51pm

आदरणीय जवाहर जी,योगराज सर,श्रद्धेय शाही जी,प्रिय अग्रज,संदीप भाई,आदरणीया राजेश जी,प्रदीप सर,आशीष भाई और राकेश भाई ...आप सभी की सराहना का तहे दिल से शुक्रगुजार हूँ|सादर वंदे

Comment by राकेश त्रिपाठी 'बस्तीवी' on April 3, 2012 at 10:44pm

वाह वाह श्री मनोज भाई, बहुत खूब! शानदार! दाद कुबूल करें.

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 3, 2012 at 4:36pm

rachna feature hone par badhai swikar karn.

Comment by आशीष यादव on April 3, 2012 at 1:12pm

उम्दा ग़ज़ल,

बधाई स्वीकार करें 
Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 3, 2012 at 1:07pm

snehi manoj ji, sadar. sare ke sare ashaar achhe, kise sabse bahiya kahoon, vah vah.

main fankar nahi fan ka rasiya hoon

sagar pila de in boondon se kya hansil

ek najar ko tarsta pradip dware pe baitha hoon....tukbandi pesh hai. badhai.  


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 3, 2012 at 1:02pm

bahut sundar ghazal bani hai.Manoj ji.

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