"""गिरधर ओ मेरे श्याम तुमसे कायनात है
ये सब है तेरा ही करम तुमसे हयात है""""
खुश्बू से तेरी जब कभी मैं रू-ब-रू हुआ
दामन-ए-हिरस-ओ-हबस बे आबरू हुआ
किस्से मैं तेरे सुन रहा हूँ एहतिराम से
पाना है तुझे अब मेरी तू जुस्तजू हुआ
रहमत की नज़र हर्फों में कैसे बयाँ करूँ
आँखों को भिगो कर हमेशा बावजू हुआ
जादू सा तेरा ये करम मैं किस तरह कहूँ
ख्वाबों में दिखा जो वही तो हू-ब-हू हुआ
तरसा मैं तेरे दीद को इक आरजू लिए
जलवा ये तेरा मैं कहूँ क्या तू ही तू हुआ
तुमसे ही मिली बरकतें मुझ नामुराद को
लब पर जो मेरे जिक्र भी कभू कभू हुआ
दर से जो तेरे दूर थे बदनाम ही रहे
आया जो तेरे दर वही अब कू-ब-कू हुआ
इज्ज़त है तेरे करम से ही इस गुलाम की
सूरज सा लगा दीप भी यूँ सुर्खरू हुआ
...........संदीप पटेल "दीप".........
Comment
भई वह संदीप जी - बहुत खूब.
भक्ति भाव से परिपूर्ण ग़ज़ल बहुत उम्दा भाव ..बधाई
तरसा मैं तेरे दीद को इक आरजू लिए
जलवा ये तेरा मैं कहूँ क्या तू ही तू हुआ,ati sundr bhaav ,badhai
बहुत खूब सूरत भाव, बधाई
waah waah Sandeep Patel DEEP ji,
bahut umda gazal.............mubaraq !
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