For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

राज़ नवादवी: मेरी डायरी के पन्ने- ३९ (जैसे कोई अतीत दबे पाँव आपके पीछे पीछे ही हमसवार है)

ऐतिहासिक इमारतों में कितना आकर्षण समाया है. इक पूरी ज़िंदगी और ज़माने का कोई थ्री डी अल्बम हों ये जैसे. ख्यालों की लम्बी दौड़ लगानेवालों के लिए गोया ये फंतासी, रूमानियत, त्रासदी, और न जाने किन किन रंगों के तसव्वुरात की कब्रगाह या कोई मज़ार हैं ये इमारतें.

 

ज़िंदगी जीते हुए जितनी हसीन नहीं लगती उससे कहीं अधिक माजी के धुंधले आईने में नज़र आती है. जैसे गर्द से आलूदा किसी शीशे में कोई हसीन सा चेहरा पीछे से झांकता नज़र आ जाए और हम खयालों में मह्व (खोए), हौले से अपनी उंगुलियाँ आगे बढ़ा दें शीशे की गर्द को मिटाने के लिए. ये ख़याल भी किसी शाइरी की तरह दिलकश है जैसे किसी अलसाई खुशबू के चंद मखमूर (नशे में) से एहसास किसी कदीम (प्राचीन) सी किताब के वरक में समाए हों और उन्हें छूते ही उन कलाइयों की याद ताज़ा हो आई हो जिनकी उंगुलियों ने  उन्हें पहली दफा अपने नर्म से लम्स (स्पर्श) से नवाज़ा था और जिनकी चूड़ियों की खनक अब भी उन तनहा रह गए वरकों (पन्नों) में लिखी नज्मों में बज रही हो.

 

इन इमारतों में जाओ तो ऐसा लगता है जैसे कोई अतीत दबे पाँव आपके पीछे पीछे ही हमसवार है, मानो आज भी किसी फूल से नाज़ुक कफेपा (पान के तलवे) से जब ज़मीन बोसादम (चुम्बन लिया था) हुई थी उस लम्हे में बज उठी पाजेब की मूसीकी (संगीत) आपके कानों में सदाएं (आवाजें) बन कर बसी हों.

 

© राज़ नवादवी

भोपाल, शनिवार प्रातःकाल १०.४६

१३/१०/२०१२ 

Views: 649

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by राज़ नवादवी on October 16, 2012 at 11:11pm

आदरणीय भाई लक्षमण साहेब, आपका ह्रदय से आभार. जो सपने में दिख जाएं तो गनीमत है, सच में उन्हें हम दीखते नहीं और हमको यकीं होता नहीं! सादर. 

Comment by राज़ नवादवी on October 16, 2012 at 11:08pm

आदरणीया सीमा जी, आपका तहेदिल से शुक्रिया! ज़िंदगी को ढूँढा तो परछईयाँ मिलीं, आफताब बनके मुझको दिखा रही थी. सादर! 

Comment by राज़ नवादवी on October 16, 2012 at 11:02pm

आदरणीया राजेश जी, ह्रदय से आपका आभार. खेद है कि चंद अरसे के बाद ही ओबीओ पे ऑनलाइन हो पाया. हम ज़िंदगी की दास्ताँ लिखते हैं, और ज़िंदगी हमें खूब लिखती है! सादर! 

Comment by राज़ नवादवी on October 16, 2012 at 11:00pm

आदरणीय सौरभ भाई साहेब, आपकी दाद साहित्य में डोक्टोरेट पाने जैसी है. हहाहाहा! हृदय से आभार. सादर!

Comment by राज़ नवादवी on October 16, 2012 at 10:58pm

आदरणीय भाई संदीप जी, आपका तहेदिल से शुक्रिया. खेद है व्यस्तताओं के कारण ओबीओ पे कुछ रोज़ से संपर्क टूटा सा रहा. 

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on October 15, 2012 at 9:45am

आदरणीय राज जी सादर प्रणाम
क्या सुन्दर शब्द चयन है मन प्रवाह में बह गया
सोचा की दीवारों की भाषा को भी समझने की इक गुंजाईश है उनमे लिखी कहानियां गुनने की जरुरत है
दिल खुश हो गया
बहुत बहुत बधाई आपको इस सरस रचना के लिए


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 15, 2012 at 7:58am

अह्होह ! क्या ही दिलकश और खूबसूरत अहसास ! स्थापत्य कला के संदर्भ में नर्म छुअन की पहली-पहली सी अनुभूति को जीते हुए देखना विभोर कर गया.. . प्रवाह में कविता और वाचन में संगीत ! राज़ साहब.. . बहुत खूब !

Comment by seema agrawal on October 14, 2012 at 10:24pm

निर्जीव दीवारों में भी ,संगीत की लहर, खुशबू ,प्यार,खोज .लेना एक सच्चे शायर की नज़रों का ही कमाल है बहुत खूबसूरत शब्दों में आपने अपनी बात कही है किसी गीत के गुनगुनाने का  सा आभास हो रहा है 

//इन इमारतों में जाओ तो ऐसा लगता है जैसे कोई अतीत दबे पाँव आपके पीछे पीछे ही हमसवार है, मानो आज भी किसी फूल से नाज़ुक कफेपा (पान के तलवे) से जब ज़मीन बोसादम (चुम्बन लिया था) हुई थी उस लम्हे में बज उठी पाजेब की मूसीकी (संगीत) आपके कानों में सदाएं (आवाजें) बन कर बसी हों.//...वाह 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 13, 2012 at 6:22pm

बहुत सुन्दर चित्रण किया है किसी  हद तक सही भी है एतिहासिक इमारतों की दीवारें बहुत बोलती हैं बस  सुनने वाले कान चाहिए अपने जज्बात साझा करती हैं बस महसूस करने वाला दिल चाहिए 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on October 13, 2012 at 4:15pm

"इन इमारतों में जाओ तो लगता है जैसे अतीत दबे पाँव आपके पीछे ही हमसवार है,मानो आज भी किसी फूल 

से नाज़ुक कफेपा से जब ज़मीन बोसादम हुई थी उस लम्हे में बज उठी पाजेब की मूसीकी आपके कानों में सदाएं

बन कर बसी हों"- ऐसा सजीव सा चित्र उकेरा लगता है जैसे सपने में दिखेगा | बधाई राज दवा नवी भाई |

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Manjeet kaur replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"ओ बी ओ मंच से बहुत कुछ सीखने को मिला इसके बंद होने की खबर दुखद और पीड़ादाई लगी। अजय गुप्ता जी की…"
9 hours ago
Manjeet kaur commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"धर्मेंद्र कुमार जी आज के मुश्किल दौर में इतना जिगरा ! यथार्थ और सटीक वर्णन के लिए बहुत बहुत बधाई"
9 hours ago
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा सप्तक. . . .मंच

दोहा सप्तक. . . . . मंचअभिनय करते मंच पर, माटी के किरदार ।जीवन की अनुभूतियाँ, करते वो साकार ।।यह जग…See More
11 hours ago
धर्मेन्द्र कुमार सिंह posted a blog post

रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)

बह्र: 22 22 22 22 22 2 रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिएजंगल का कानून है पहला, चुप रहिएमँहगाई से…See More
15 hours ago
रोहित डोबरियाल "मल्हार" posted a blog post

दास्तां

एक हो दास्तां तो सुनाएं,लंबी है कहानी, फिर कभी।मिले थे जिस जगह इक उम्र पहले,वो धुंधली सी निशानी,…See More
15 hours ago
Awanish Dhar Dvivedi posted a blog post

समय

समय को दोष देना क्यूँ समय जीना सिखाता है समय की गति सुनिश्चित है समय ही तो विधाता है।। समय का खेल…See More
15 hours ago
धर्मेन्द्र कुमार सिंह commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post देश की बदक़िस्मती थी चार व्यापारी मिले (ग़ज़ल)
"बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय सौरभ जी"
16 hours ago
आशीष यादव replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"उम्मीद है कि इस पटल से संबंधित कोई अच्छी खबर आएगी।"
22 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post देश की बदक़िस्मती थी चार व्यापारी मिले (ग़ज़ल)
"इस सुंदर बुनावट और कहन पर आज नजर पड़ी, आदरणीय धर्मेन्द्र जी.  हार्दिक बधाई   "
Monday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' shared their blog post on Facebook
May 24
धर्मेन्द्र कुमार सिंह commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post देश की बदक़िस्मती थी चार व्यापारी मिले (ग़ज़ल)
"बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय Ravi Shukla जी"
May 24
धर्मेन्द्र कुमार सिंह commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post देवता चिल्लाने लगे हैं (कविता)
"बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय Ashok Kumar Raktale जी"
May 24

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service