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क्यूंकि तुम प्रेम हो और प्रेम मैं भी हूँ .......

मैं प्रेम हूँ 

तुम भी तो प्रेम ही हो 

प्रेम से हट कर 

क्या नाम दूँ 

तुम्हें भी और मुझे भी ...

कितनी सदियों से 

और जन्मो से भी 

हम साथ है 

जुड़े हुए एक-दूसरे के 

प्रेम में 

हर जन्म में तुमसे 

मिलना हुआ 

लेकिन मिल के भी मेल 

ना हो सका 

प्रेम फिर भी रहा 

तुम में और मुझ में भी 

चलते जा रहें है 

समानांतर रेखाओं की तरह 

साथ हो कर भी साथ नहीं 

दिखावे की है लेकिन ये 

समानांतर रेखाए 

प्रेम ने तो अब भी बांधा 

हुआ है 

तुम्हें  भी और मुझे  भी 

क्यूंकि तुम प्रेम हो और 

प्रेम मैं भी हूँ .......

( अप्रकाशित और मौलिक  )

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Comment by रविकर on March 1, 2013 at 3:39pm

प्रेम पर तनहा दृष्टिकोण-
आभार आदरेया -


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 1, 2013 at 2:09pm

मधुर भावनाओं का परस्पर विदित संप्रेषण स्वीकृति के स्तर पर असहज तथा असंभव प्रतीत हो तो जिस विकट परिस्थिति का कारण होता है, प्रेमी मन सदा से साक्षी रहा है. इन भावों को शब्दबद्ध करने के लिए आपको सादर बधाई उपासना जी... .

Comment by Meena Pathak on March 1, 2013 at 1:58pm

क्यूंकि तुम प्रेम हो और 

प्रेम मैं भी हूँ ....... बहुत सुन्दर रचना ..बहुत-बहुत बधाई उपासना जी 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on March 1, 2013 at 12:58pm

प्रेम की बहुत सुन्दर अनुभूति को सांझा करती सुन्दर रचना के लिए हार्दिक बधाई 

Comment by नादिर ख़ान on March 1, 2013 at 11:29am

 सुन्दर अभिव्यक्ति.....upasana g

Comment by राजेश 'मृदु' on March 1, 2013 at 11:15am

आपकी रचना में एक अर्न्‍तवार्तालाप होता है, कभी लगता है दो अलग लोग हैं पर फिर थोड़ा गहरे उतरने पर लगता है कि दोनों एक ही हैं, मन के दो पक्ष और दोनों ही कभी भरे कभी खाली प्रतीत होते हैं, बहुत अच्‍छी रचना है

Comment by सतवीर वर्मा 'बिरकाळी' on March 1, 2013 at 10:10am
प्रेम की बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति दी मोहतरमा जी। इसी प्रेम की बदौलत हम आपस में जुङे हुए हैं। प्रेम ही शास्वत सत्य है जिसके बिना संसार की कोई गति नहीं है।

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