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झुलसाई ज़िन्दगी ही तेजाब फैंककर ,

 

 Pakistani Shiite Muslim women. Credit: Getty Images

 

झुलसाई ज़िन्दगी ही तेजाब फैंककर ,
दिखलाई हिम्मतें ही तेजाब फैंककर .

अरमान जब हवस के पूरे न हो सके ,
तडपाई  दिल्लगी से तेजाब फैंककर .

ज़ागीर है ये मेरी, मेरा ही दिल जलाये ,
ठुकराई मिल्कियत से तेजाब फैंककर .

मेरी नहीं बनेगी फिर क्यूं बने किसी की,
सिखलाई बेवफाई तेजाब फैंककर .

चेहरा है चाँद तेरा ले दाग भी उसी से ,
दिलवाई निकाई ही तेजाब फैंककर .

 

 देखा है प्यार मेरा अब नफरतों को देखो ,
झलकाई मर्दानगी तेजाब फैंककर .

 

 शैतान का दिल टूटे तो आये क़यामत ,
निपटाई हैवानगी तेजाब फैंककर .

 

 कायरता है पुरुष की समझे बहादुरी है ,
छलकाई बेबसी ही तेजाब फैंककर .

 

 औरत न चीज़ कोई डर जाएगी न ऐसे ,
घबराई जवानी पर तेजाब फैंककर .

उसकी भी हसरतें हैं ,उसमे भी दिलावरी ,
धमकाई बेसुधी ही तेजाब फैंककर .

 

 चट्टान की मानिंद ही है रु-ब-रु-वो तेरे ,
गरमाई ''शालिनी'' भी तेजाब फैंककर .

       शालिनी कौशिक
             [कौशल]

Views: 436

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Comment by shalini kaushik on May 17, 2013 at 12:55am

thanks ram shiromani i .

Comment by ram shiromani pathak on May 16, 2013 at 1:34pm

सुन्दर भावों की रचना के लिए बधाई शालिनी कौशिक जी 

Comment by अरुन 'अनन्त' on April 4, 2013 at 2:10pm

आदरेया शालिनी जी एक कटु और बुरा सत्य जो आज के समाज में व्याप्त है, समाज की खोखली कुरीतियों के विरुद्ध तेजाब भी कम है. सजा तो ऐसी हो न जिया जाए और न मरा जाए. खैर आपकी लेखनी में आक्रोश को देखकर बहुत ही अच्छा लगा. हार्दिक बधाई स्वीकारें.

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on April 4, 2013 at 9:13am

सुन्दर भावों की रचना के लिए बधाई शालिनी कौशिक जी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 3, 2013 at 9:31pm

भाव हमेशा की तरह शानदार हैं हार्दिक बधाई शालिनी जी 

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on April 3, 2013 at 9:24pm

बहुत अच्छे भाव पिरोये हैं आपने .................सादर बधाई आपको

गुरुजनों के कहे को समझ उसमे अमल करेंगे तो प्रयास और भी सुखद हो जाएगा

सादर

Comment by Ashok Kumar Raktale on April 3, 2013 at 8:31pm

आदरणीया शालिनी कौशिक जी सादर तेज़ाब को हथियार के रुप में इस्तेमाल पर आपने बहुत खूब लिखा है. हमारी सरकार को भी क्या रहम आया इन दरिंदों पर की गैर जमानती से इसे जमानती जुर्म में शामिल कर लिया है.सुन्दर रचना. गजल के विधान को समझकर लिखें तब एक उम्दा गजल तैयार होने को बेताब नजर आ रही है. सुन्दर रचना पर बधाई स्वीकारें.

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 3, 2013 at 7:19pm

आदरणीया शालिनी कौशिक’कौशल’ जी, मुझे गजल तो पसंद है पर कभी लिखा नहीं। आप द्वारा प्रस्तुत गजल में भाव,  अंगार, दर्द तथा कुछ करने का हौसला तो बुलन्द है किन्तु जैसा कि गुरूवर जी ने कहा काव्यगत विधान अवश्य देखें। सुन्दर। सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 3, 2013 at 5:42pm

एक अच्छी भाव दशा और सुदृढ कहन अनगढ़ विधा और असहज काव्य-साधन के कारण दोयम भर हो कर रह गयी है.

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