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सागर में भी तडपे मछली , जब लहरों में फँस जाये |

जाल में पडी मछली रोये -कविता |
सागर में भी तडपे मछली , जब लहरों में फँस जाये |
जाल डाले आते शिकारी , फिर उनसे कौन बचाये |
साथ  नहीं देता जब कोई , फिर आशा कौन दिलाये |
जब फँस गयी माया जाल में  , बस रब की आश लगाये |
खाने वाले ज्यादा जग में , नहीं  हैं  बचाने वाले | 
जब मस्ती में झूमे कोई , पिस जाते  रोने वाले | 
रोना धोना किसे सुहाता , सुन !चोट तड़पने वाले |
कभी बात जब बाहर आये , तब जानें  दुनिया वाले |
जाल में पडी मछली रोये , बस बहता जाता पानी |
तड़प तड़प कर मर मिट जाये , बनती है एक कहानी |
किसको कहाँ कौन संभाले , कोई चाहे  मनमानी  | 
खेत चुग गयी चिड़िया आकर   , बात बनी वहीँ पुरानी |
जब लोग  शान पर मरते हैं , विवश रहे  टोपी वाला |
जब आग धधकती रहती हैं , घी डाले  धोती वाला |
रोज नयी मछली ही जलती , चुप देखता पुलिस वाला | 
वर्मा माया की दुनिया में , आवो ! रोको घोटाला |
श्याम नारायण वर्मा 

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on April 14, 2013 at 3:39pm

मनुष्य की बेबसी की दशा को छटपटाती मछली के समकक्ष रहते हुए मनोभावों की अभिव्यक्ति.. 

प्रस्तुति के लिए बधाई आ० श्याम नारायण वर्मा जी 

Comment by Ashok Kumar Raktale on April 14, 2013 at 12:25pm

आदरणीय श्याम नारायण वर्मा जी सादर, सुन्दर कविता है. अच्छे भाव हैं किन्तु आदरनीय बृजेश जी की बात भी सही है एक आलोचक की तरह अपनी रचना पढ़ने से कुछ सुधार तो अवश्य हो होते हैं.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on April 14, 2013 at 10:22am

सुंदर प्रयास.....

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on April 13, 2013 at 9:45pm

बहुत ही सुन्दर प्रयास हुआ है उसके लिए आपको बधाई 

तत 

आदरणीय बृजेश जी के कहे से सहमत हूँ 

सादर 

Comment by बृजेश नीरज on April 13, 2013 at 7:22pm

सुन्दर प्रयास! मेरा अपना अनुभव है कि अपनी रचना को खुद कई बार पढ़ना चाहिए। इससे अपनी कई गलतियां पता चलती हैं रचना और सुधर कर आती है।

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on April 13, 2013 at 3:58pm

सुन्दर प्रयास के लिए बधाई श्री श्याम नारायण वर्मा जी 

Comment by coontee mukerji on April 13, 2013 at 12:13am

श्याम नारयण जी , आपने अपनी रचना में बहुत सारे confusion पैदा कर रखे है .एक भाव को लेकर आप बहुत कुछ कहना तो चाहते

हैं मगर शैली का उचित स्थान न दे पाये है  आप इस रचना पर पुनः विचार करें.धन्यवाद .

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 12, 2013 at 10:47pm

आ0 श्याम नारायण वर्मा जी, "रोज नयी मछली ही जलती, चुप देखता पुलिस वाला !
वर्मा माया की दुनिया में आवो ! रोको घोटाला।" अतिसुन्दर, हार्दिक बधाई स्वीकारें। सादर,

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