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ग़ज़ल - बारिश के ख़त लाते हैं , बादल बंद लिफ़ाफे हैं

ग़ज़ल –

फैलुन फैलुन फैलुन फा

२२ २२ २२ २

 

बारिश के ख़त लाते हैं |

बादल बंद लिफ़ाफ़े हैं |

 

खेतों में पानी भर दो ,

पौधे भूखे प्यासे हैं |

 

हमने क्या ग़द्दारी की ,

सारे पेड़ रुआसे हैं |

 

मौत तुम्हारे आने तक ,

क्या क्या खेल तमाशे हैं |

 

फूल गुमां करते हो क्यों ,

मौसम आते जाते हैं |

 

ख़ुशबू तो रह जाती है ,

बेशक हम कुम्हलाते हैं |

 

कीचड़ से याराना कर ,

फूल कमल कहलाते हैं |

 

जिनको नींद नहीं आती ,

तारों से बतियाते हैं |

 

जो सच की खेती करते ,

उनके घर में फाके हैं |

 

घंटे भर की बारातें ,

अब किसके जनवासे हैं |

 

चाँद सितारों का सेहरा ,

तेरे ख़ूब सरापे हैं |

* मौलिक अप्रकाशित.

             - अभिनव अरुण 

              [ १५०२२०१४ ]

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Comment by अनिल कुमार 'अलीन' on February 16, 2014 at 10:03pm

आदरणीय!

बेहतरीन.......................लाजवाब.......................रचना ................जीतनी तारीफ की जाय कम..............

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 16, 2014 at 5:32pm

आदरणीय भाई अभिनव जी , हर एक शेर के लिए बधाई स्वीकारें .

Comment by CHANDRA SHEKHAR PANDEY on February 15, 2014 at 4:47pm
वाह वाह क्या बात है। जय हो
Comment by Dr Ashutosh Mishra on February 15, 2014 at 2:06pm

बारिश के ख़त लाते हैं |

बादल बंद लिफ़ाफ़े हैं |

फूल गुमां करते हो क्यों ,

मौसम आते जाते हैं |

जो सच की खेती करते ,

उनके घर में फाके हैं |//आदरणीय अबिनव जी  ग़ज़ल के माध्यम जीवन दर्शन को सुंदर प्रतीकों के माध्यम से चित्रित करने की जो कोशिस की है उसके लिए मेरी तरफ से तहे दिल बधाई ..सादर 

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on February 15, 2014 at 1:38pm

अच्छी गज़ल हुई है भाई, ले लो मेरी बधाई।

Comment by gumnaam pithoragarhi on February 15, 2014 at 1:26pm

बारिश के ख़त लाते हैं |

बादल बंद लिफ़ाफ़े हैं |

 

जो सच की खेती करते ,

उनके घर में फाके हैं |

फूल गुमां करते हो क्यों ,

मौसम आते जाते हैं |

 

ख़ुशबू तो रह जाती है ,

बेशक हम कुम्हलाते हैं |

 

बहुत  बहुत खूब सर जी बधाई स्वीकारें अच्छी ग़ज़ल के लिए ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

 

Comment by ram shiromani pathak on February 15, 2014 at 12:51pm

कीचड़ से याराना कर ,

फूल कमल कहलाते हैं |

जिनको नींद नहीं आती ,

तारों से बतियाते हैं |

जो सच की खेती करते ,

उनके घर में फाके हैं |//////////वाह वाह बहुत ही प्यारी ग़ज़ल आदरणीय।।। हार्दिक बधाई आपको

Comment by Shyam Narain Verma on February 15, 2014 at 12:43pm
"क्या बात है ..... बहुत खूब ... बधाई आप को ........
Comment by Meena Pathak on February 15, 2014 at 12:19pm

क्या बात ...बहुत सुन्दर .. बधाई आदरणीय 

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