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मेरे वज़ूद की ज़मीं पे

मेरे वज़ूद की
ज़मीं पे
उग आये हैं
यादों के तमाम
कैक्टस और बबूल
जो लम्हा - लम्हा
छलनी करते जा रहे हैं
मेरे जिस्मो जाँ को

और अब

मेरे जिस्म पे
छप गयी है
नीली स्याही से
एक उदास नज़्म
किसी गोदने की तरह

जो मेरी,
पहचान बनती जा रही है

मुकेश इलाहाबादी -----
(मौलिक/अप्रकाशित)

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 7, 2014 at 2:16am

आदरणीय मुकेशजी, एक अरसे बाद पुनः आपको पढ़ना अच्छा लग रहा है.

इस सशक्त कविता के लिए हार्दिक बधाई,


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on June 30, 2014 at 8:05pm

सायकिक इम्प्रेशन्स से नित आकार लेता है इंसान का व्यक्तित्व 

पर इस तरह...

नीली स्याही से
एक उदास नज़्म
किसी गोदने की तरह

इस गम और दर्द की अभिव्यक्ति पर वाह! कैसे हो 

शुभकामनाएं आदरणीय मुकेश श्रीवास्तव जी 

Comment by MUKESH SRIVASTAVA on June 26, 2014 at 3:25pm

htnx - is hauslaa aafzaaee ke liye = Annupurna Bajpai jee - Aha Pandey Ojha, Jawahar Lala jee

Comment by annapurna bajpai on June 25, 2014 at 6:37pm

छोटी साकार प्रस्तुति , बधाई । 

Comment by asha pandey ojha on June 25, 2014 at 4:06pm

behtreen

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on June 25, 2014 at 11:48am

बेहतरीन प्रस्तुति!

Comment by MUKESH SRIVASTAVA on June 23, 2014 at 10:03pm

JEE- SABHEE MTIRAON KO RACHNAA PASANDGEE KE LIYE BAHUT BAHUT AAABHAAR - VISHESH ROOP SE - MEENA DHAR PAATHAK JEE, RAJESH KUMARI JEE, Dr. GOPAL NARAYAN SRIVASTAVA JEE AUR OPEN BOOKS KE SABHEE PAATHKO KO


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 23, 2014 at 9:26pm

कभी कभी यादें इंसान के वजूद पर इस कदर हावी हो जाती हैं ,आपकी प्रस्तुति में देखते ही बनता है कुछ ही शब्दों में आपने अपनी जिन्दगी के तमाम बर्खों को खोल दिया ...वाह वाह बहुत सुन्दर प्रस्तुति मुकेश जी बधाई आपको| 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 23, 2014 at 7:34pm

मुकेश जी

कम शब्दों में दमदार बात i बधाई हो i  बहुत सुन्दर i

Comment by Meena Pathak on June 23, 2014 at 12:15pm

और अब

मेरे जिस्म पे
छप गयी है
नीली स्याही से
एक उदास नज़्म
किसी गोदने की तरह

जो मेरी,
पहचान बनती जा रही है.................बहुत सुन्दर .. बधाई आप को | सादर 

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