For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

MUKESH SRIVASTAVA's Blog (33)

"मै" इक  समंदर में तब्दील हो जाता हूँ

एक 
--------
रात 
होते ही 
"मै" इक  समंदर में तब्दील हो जाता हूँ 
और मेरे सीने के
ठीक ऊपर 
इक चाँद उग आता…
Continue

Added by MUKESH SRIVASTAVA on February 20, 2020 at 5:30pm — 1 Comment

टीन एजर बेटे के मेसेज - मम्मी के लिए

एक

-----

मुझे,

मालूम है आप

मेरी लापरवाहियां और बेतरतीबी की लिए

ऊपर ऊपर डांटते हुए भी

अंदर अंदर खुशी से और मेरे लिए प्रेम से भरपूर रहती हो

मेरे बिखरे हुए कपड़ों व किताबों को सहेजना अच्छा लगता है

पर यहाँ हॉस्टल में आ कर अब मुझे अपने कपडे खुद तह कर के रखना सीख लिया है

वहां तो आप सुबह ब्रश में टूथ पेस्ट भी आप लगा के देती थी

टोस्ट में मक्खन भी लगा के हाथ में पकड़ा देती थी

और प्यार भरी झिड़की से जल्दी से खाने की हिदायत देती थी

पर…

Continue

Added by MUKESH SRIVASTAVA on February 15, 2020 at 5:30pm — No Comments

प्रेम गली अति सांकरी

प्रेम गली अति सांकरी

------------------------

सुमी,



सुना है, किसी सयाने ने कहा है। ' प्रेम गली अति सांकरी, जा में दुई न समाय'

जब कभी सोचता हूँ इन पंक्तियों के बारे में तो लगता है, ऐसा कहने वाला, सयाना

रहा हो या न रहा हो, पर प्रेमी ज़रूर रहा होगा,जिसने प्रेम की पराकष्ठा को जाना होगा

महसूस होगा रोम - रोम से , रग - रेशे से, उसके लिए प्रेम कोई शब्दों का छलावा न

रहा होगा, किसी कविता का या ग़ज़ल का छंद और बंद न रहा होगा, किसी हसीन

शाम की यादें भर न रही होगा,…

Continue

Added by MUKESH SRIVASTAVA on February 12, 2020 at 1:58pm — 4 Comments

कुर्सी

गुफा

से निकले हुए लोगों ने

'कुर्सी' बनाई,

अपने राजा के लिए

ज़मीन पर बैठे - बैठे

राजा कुर्सी पर बैठा है शान से

कुर्सी बनाने वाले ज़मीन पर

सबसे पहली कुर्सी 'पत्थर' की थी

फिर इंसान ने लकड़ी की कुर्सी बनाई

बाद में सोने ,चाँदी ,हीरे, जवाहरात की भी....

इतिहास में तो कई बार नरमुंडों की भी कुर्सियां बनाई गयी

और फिर उस पर बैठ के 'राजा' बहुत खुश हुआ...

कुर्सी बनाई गयी थी

इस उम्मीद में कि इस पर बैठा हुआ

राजा राज्य में

सुख शांति…

Continue

Added by MUKESH SRIVASTAVA on September 23, 2017 at 3:06pm — 5 Comments

मुट्ठी भर ताकतवर और बुद्धिमान



मुट्ठी भर 

ताकतवर 

और बुद्धिमान 

लोगों ने 

इकठ्ठा किया 

ढेर सारे लोगों को 

और 

आवाहन किया  

कहा 

"हमें इस धरती को 

स्वर्ग बनाना है 

और बेहतर बनाना है "



और हम 

चल पड़े 

तमाम जंगल काटते हुए 

पहाड़ों को रौंदते…

Continue

Added by MUKESH SRIVASTAVA on September 18, 2017 at 3:29pm — 3 Comments

एक पति की आत्मस्वीक्रति

  चुन्नों, मेरा चश्मा कंहा रखा है ? चुन्नो मेरी नयी वाली कमीज नहीं मिल रही है, चुन्नो तुमने मेरा रुमाल देखा है क्या? चुन्नो एक कप चाय मिलेगी क्या? चुन्नो चुन्नो चुन्नो सच घर आते ही चुन्नो चुन्नो के नाम की माला जपने लगता हूं। सच आफिस मे रहता हूं तो आफिस की छोटी छोटी बातें नही भूलती पर घर आते ही जैसे यादें हैं कि साथ छोड के फिर से आफिस मे ही दुपुक जाती हैं ये कह के कि जाओ अब अपनी चुन्नो के साथ ही रहो मेरी क्या जरुरत है वो जो है न तुम्हारी और…

Continue

Added by MUKESH SRIVASTAVA on September 17, 2017 at 11:30am — 5 Comments

मै एक पेड़ होता और तुम होती गिलहरी

काश,

मै एक पेड़ होता

और तुम होती

गिलहरी

जो अपनी बटन सी

चमकती आँखों से

इधर - उधर देखती

ऊपर चढ़ती और कभी उतरती

तुम्हे देखता

चुक -चुक करते हुए हरी पत्तियों को

अपने मुहे में दबाये हुए फुदकते हुए

और फिर ज़रा सी आवाज़ या

आहट से भाग के मेरे तने की खोह में छुप जाना

जैसे, तुम दुपुक जाती थी

मेरी बाँहों में,

उन दिनों जब हम तुम दोनों थे

एक दूजे के गहन प्रेम में

(हलाकि मै तो आज भी हूँ

तुम्हारे प्रेम में, तुम्हारा पता नहीं… Continue

Added by MUKESH SRIVASTAVA on September 9, 2017 at 11:06pm — 8 Comments

रंग बिरंगा हो गया हूँ

रंग बिरंगा हो गया हूँ,

------------------------------

जैसे

कच्ची दोमट

मिट्टी का धेला

धीरे धीरे घुलता है

बारिस के पानी में

और पानी मटमैला मटमैला हो जाता है

मिट्टी की सोंधी सोंधी महक के साथ

बस ऐसी ही

तुम घुलती हो मुझमे

और घुलता जाता है

तुम्हारी आँखों की पुतली का

ये कत्थई रंग

सिर्फ आँखों का रंग ही क्यूँ

तुम्हारे काजल का गहरा काला

आँचल का आसमानी

गालों का गुलाबी

होंठो का मूँगिया

और तुम्हारी हंसी का दूधिया…

Continue

Added by MUKESH SRIVASTAVA on September 7, 2017 at 4:39pm — 5 Comments

चुप्पी

चुप्पी में
कई चीखते हुए सवाल हैं
शायद
जिनके उत्तर
किसी भी पोथी
किसी भी दिग्ग्दर्शिका
किसी भी धर्मग्रन्थ
में नहीं हैं
अगर रहे भी हों तो
उन्हें मिटा दिया गया है
हमेसा हमेसा के लिए
ताकि
इन चुप्पियों से
कोई आवाज़ न उठे
चुप कराने वालों के ख़िलाफ़

मुकेश इलाहबदी --------

मौलिक और अप्रकाशित

Added by MUKESH SRIVASTAVA on February 4, 2016 at 11:11am — 13 Comments

जब तक मै रहूंगा ‘आदम’ और तुम ‘ईव’

प्रिये,

सच तो ये है

जब तक मै रहूंगा ‘आदम’

और तुम ‘ईव’

तब तक हम खाते रहेंगे ‘सेब’

भोगते रहेंगे 'नर्क'

इससे तो बेहतर है

'मै' बन जाउं 'जंगल'

घना ओर बियाबान

तुम बहो उसमे

'नदी' सा हौले - हौले

या फिर मै

टंग जाउं आसमान मे

चॉद सा

और तुम बनो

मीठे पानी की झील

सांझ होते ही मै

उतर आउं जिसमे

चुपके से,

हिलूं। तैरूँ। इतराऊँ

सुबह होते ही फिर

टंग जाऊँ आसमान मे

या तो,

ऐसा करते हैं

मै बन जाता हूं…

Continue

Added by MUKESH SRIVASTAVA on January 28, 2016 at 11:48am — 7 Comments

पत्थर की मूर्ति

सुना तो यह गया है, वह पत्थर की देवी थी।  पत्थर की मूर्ति। संगमरमर का तराशा हुआ बदन। एक - एक नैन नक्श, बेहद खूबसूरती से तराशे हुए। मीन जैसी ऑखें ,सुराहीदार गर्दन, सेब से गाल। गुलाब से भी गुलाबी होठ। पतली कमर। बेहद खूबसूरत देह यष्टि। जो भी देखता उस पत्थर की मूरत को देखता ही रह जाता। लोग उस मूरत की तारीफ करते नही अघाते थे। सभी उसकी खूबसूरती के कद्रदान थे। कोई ग़ज़ल लिखता कोई कविता लिखता। मगर इससे क्या। . .. ? वह तो एक मूर्ति भर थी। पत्थर की मूर्ति।

सुना तो यह भी गया था, कि वह हमेसा से…

Continue

Added by MUKESH SRIVASTAVA on January 13, 2016 at 1:00pm — 7 Comments

जब तुम हंसती हो झरते हैं,

जब

तुम हंसती हो
झरते हैं,
दशों दिशाओं से
इंद्रधनुषी झरने
हज़ार - हज़ार तरीके से
नियाग्रा फाल बरसता हो जैसे
तब,
सूखी चट्टानों सा
मेरा वज़ूद
तब्दील हो जाता है
एक हरी भरी घाटी में
जिसमे तुम्हारी
हंसी प्रतिध्वनित होती है
और मै,
सराबोर हो जाता हूँ
रूहानी नाद से
जैसे कोई योगी नहा लेता है
ध्यान में उतर के
अनाहत नाद की
मंदाकनी में

मुकेश इलाहाबादी ----

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by MUKESH SRIVASTAVA on November 30, 2015 at 1:00pm — 10 Comments

सारा आलम, धुँआ - धुँआ हो जाये

 सारा आलम,

धुँआ - धुँआ हो जाये

इसके पहले

बचा लेना चाहता हूँ

थोड़ी से 'हवा'

पारदर्शी और स्वच्छ

जो बहुत ज़रूरी है

स्वांस लेने के लिए

ज़िंदा रहने के लिए…

Continue

Added by MUKESH SRIVASTAVA on November 4, 2015 at 9:30am — 4 Comments

जंगल बदल चुके हैं

 जंगल बदल चुके हैं

चूँकि,  

जंगल बदल चुके हैं 

बस्तियों में या फिर 

फॉर्म हाउसेस में 

लिहाज़ा अब 

जंगल में  

हरे भरे फलों से लदे 

पेड़ नहीं मिलते …

Continue

Added by MUKESH SRIVASTAVA on September 16, 2015 at 12:00pm — 5 Comments

माँ पढ़ लेती है

माँ पढ़ लेती है

अपनी मोतियाबिंदी आखों

और मोटे फ्रेम के चश्मे से

रामायण की चौपाइयां

हिंदी अखबार की

मुख्य मुख्य ख़बरें

यहाँ तक कि, 

मोबाइल में

अंग्रेज़ी में लिखे नाम भी

पढ़ लेती हैं

कि यह छोटके का फ़ोन है

कि यह बड़के का फ़ोन है

कि बिटिया ने फ़ोन किया है

भले ही बड़ी बड़ी किताबें न पढ़ पाती हों 

पर आज भी पढ़ लेती हैं

हमारा चेहरा

हमारा मन

हमारा दुःख

हमारी तकलीफ…

Continue

Added by MUKESH SRIVASTAVA on July 10, 2015 at 11:29am — 4 Comments

बिट्टो

एक

----

मेरा नाम बिट्टो है,

कल मेरे गाँव का मेला है

सब खुश हैं

मेरी सहेली चुनिया

कह रही थी वह अब की

कान के बुँदे और कंगन लेगी

गुड्डू कह रहा था

वह इस बार बाबू से कह के

मेले में नुमाइश देखेगा

मेरा छुटका भाई

बैट बाल लेगा

अम्मा अपना टूटा तवा बदलेंगी

बाबू कुछ नहीं लेंगे

और मै भी कुछ नहीं लूंगी

क्यों कि हमें मालूम है

उनके पास बहुत ज़्यादा पैसे नही हैं

मै सिर्फ चुपचाप मेला देख के आ जाऊँगी…

Continue

Added by MUKESH SRIVASTAVA on July 10, 2015 at 11:00am — 3 Comments

सडक एक नदी है। बस स्टैण्ड एक घाट।

 

 सडक एक नदी है।

बस स्टैण्ड एक घाट।

इस नदी मे आदमी बहते हैं। सुबह से शाम तक। शाम से सुबह तक। रात के वक्त यह धीरे धीरे बहती है। और देर रात गये लगभग रुकी रुकी बहती है। पर सुबह से यह अपनी रवानी पे रहती है। चिलकती धूप और भरी बरसात मे भी बहती रहती है । भले यह धीरे धीरे बहे। पर बहती अनवरत रहती है।



सडक एक नदी है इस नदी मे इन्सान बहते हैं। सुबह से शाम बहते हैं। जैसा कि अभी बह रहे हैं।

बहुत से लोग अपने घरों से इस नदी मे कूद जाते हैं। और बहते हुये पार उतर जाते हैं। कुछ लोग…

Continue

Added by MUKESH SRIVASTAVA on May 1, 2015 at 10:27am — 8 Comments

दुःख, सिर्फ दुःख होता है

थोड़ी छाँव और

ज़्यादा धूप  में बैठी

बुढ़िया भी

अपने

चार करेले और

दो गड्डी साग न बिकने

पर उतना दुखी नहीं हैं

जितना नगर श्रेष्ठि

नए टेंडर न मिलने पर है



कलुवा

हलवाई  की भटटी

सुलगाते हुए अपने

हम उम्र बच्चों को  फुदकते हुए

नयी नयी ड्रेस और बस्ते के साथ

स्कूल जाते देख भी उतना दुखी नहीं है

जितना सेठ जी का बेटा

रिमोट वाली गाड़ी न पा के है



प्रधान मंत्री जी

हज़ारों किसान के सूखे से

मर जाने की खबर…

Continue

Added by MUKESH SRIVASTAVA on April 21, 2015 at 12:31pm — 9 Comments

गौरैया खुश थी

गौरैया

खुश थी

चोंच मे सतरंगी सपने लिये

आसमान मे उड रही थी

उधर,

गिद्ध भी खुश था

गौरैया को देखकर

उसने अपनी पैनी नजरे गडा दी

मासूम गौरैया पे,

और दबोचना चाहा अपने खूनी पंजे मे

गौरैया, घबरा के भागी पर कितना भाग पाती ??

आखिर,

गिद्ध के पंजे मे आ ही गयी

गौरैया फडफडा रही थी, रो रही थी

गिद्ध खुश था अपना शिकार पा के

कुछ देर बाद

गौरैया अपने नुचे और टूटे पंखों के साथ

लहूलुहान जमीं पे पडी…

Continue

Added by MUKESH SRIVASTAVA on March 23, 2015 at 11:30am — 9 Comments

पहाड़ और पीठ

 

पहाड़ और पीठ



एक



पहाड़,

सिर्फ पीठ होता है

मुह होता तो बोलता

पहाड़ के पैर भी नही होते

हाथ भी

वरना वह चलता

कुछ करता या,

उठता बैठता भी

पहाड़, अपनी पीठ पर

लाद लेता है तमाम जंगल नदी नाले,

हरी भरी झील भी

सड़क और बस्तियां भी

और कुछ नही बोलता

क्यों कि,

पहाड़ सिर्फ पीठ है

और पीठ कुछ नही बोलती



दो,



पीठ,

पहाड़ नही होती

पर लाद लेती है पहाड़

पीठ के भी मुह नही होता

पहाड़ की तरह होती है एक…

Continue

Added by MUKESH SRIVASTAVA on February 13, 2015 at 12:24pm — 9 Comments

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

आशीष यादव replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"जिस प्रकार हम लाइव तरही मुशायरा, चित्र से काव्य तक, obo लाइव महा उत्सव इत्यादि का आयोजन करते हैं…"
17 hours ago
सतविन्द्र कुमार राणा replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"मैं लगभग 10 वर्ष पहले इस मंच से जुड़ा, बहुत कुछ सीखने को मिला। पारिवारिक व्यस्तता के कारण लगभग सोशल…"
18 hours ago
Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"अगर हमारे समूह में कोई व्यवसायी हैं और उनके पास कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी फंड्स हों तो वे इसके…"
20 hours ago
Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"सदस्यों में रुचि के अभाव ने इसे बंद करने के विचार का सूत्रपात किया है। ऐसा लगने लगा था कि मंच को…"
20 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
" एक दुखद स्थिति बन रही है. लेकिन यह नई नहीं है. जब आत्मीयजनों और ओबीओ के समृद्ध सदस्यों की…"
21 hours ago
आशीष यादव replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"मै मंच के प्रारंभिक दिनों से ही जुड़ा हुआ हूं। इसका बंद होना बहुत दुखद होगा। मुझे लगता है कि कुछ…"
yesterday
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"आदरणीय गणेश जी, जितना कष्ट आपको यह सूचना देते हुए हो रहा है, उतना ही कष्ट हम सब को यह सुनने में हो…"
yesterday
Nilesh Shevgaonkar replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"दु:खद "
yesterday
Admin posted a discussion

अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....

प्रिय सदस्य गण / प्रबंधन समिति के सदस्य गण / ओ बी ओ के सभी पाठक एवं शुभचिंतक गणसादर प्रणामआप सभी…See More
yesterday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-133 (विषय मुक्त)
"हाड़-मॉंस स्ट्रेट (लघुकथा) : "नेता जी ये क्या हमें बदबूदार सॅंकरी गलियों वाली बस्ती के दौरे…"
Thursday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-133 (विषय मुक्त)
"सादर नमस्कार आदरणीय मंच। इंतज़ार है साथियों की सार्थक रचनाओं का, सहभागिता का। हम भी हैं कोशिश में।"
Thursday
Admin posted a discussion

"ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-133 (विषय मुक्त)

आदरणीय साथियो,सादर नमन।."ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" में आप सभी का हार्दिक स्वागत है।प्रस्तुत…See More
Tuesday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service