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मातु भारती (त्रिभंगी छंद)

हे भाग्य विधात्री, जन सुख दात्री, मातु भारती, वंदन है ।
मां माटी तोरी, सौंधी भोरी, रज कण माथे, चंदन है ।।
गिरि हिम आच्छादित, करते प्रमुदित, मुकुट मणी सा, सोहत है ।
धरा मनोहारी, मातु तुम्हारी, हरि हर को भी, मोहत है।।
...............................................................
मौलिक अप्रकाशित

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 8, 2014 at 4:39pm

आ० रमेश कुमार चौहान जी 

त्रिभंगी छंद पर बहुत सुन्दर प्रयास हुआ है..

हार्दिक बधाई इस जटिल छंद पर कलम चलाने के लिए.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 7, 2014 at 4:20am

त्रिभंगी पर अच्छी चर्चा हुई है. 

तुम्हारी  को पँचकल ही मानें. यह शास्त्र सम्मत है

शुभ-शुभ

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 1, 2014 at 9:22am

......... बहुत खूब आदरणीय भाई रमेश जी हार्दिक बधाई स्वीकारें ।

Comment by बृजेश नीरज on July 1, 2014 at 7:25am
अच्छा प्रयास है। आपको हार्दिक बधाई।
Comment by रमेश कुमार चौहान on June 30, 2014 at 12:25pm

आदरणीया राजेश दी,श्रीवास्तव जी एवं लड़ी वालाजी आप सभी इस उत्साह वर्धन के लिये हार्दिक आभार ।
         आदरणीय श्रीवास्तवजी छंद सम कला के मात्रिक गण होने से मात्रिक मैत्री का नियम पालनीय है। । प्रथम चरण में 2,4,4 के दस मात्राएं होनी चाहिये किन्तु  कुछ उदाहरण में  त्रिकल त्रिकल के योग से षटकल पश्चात चैकल लिया गया जिस आधार पर ये प्रयोग करने का दुस्साहस कर बैठा । वास्तव में हम अभ्यासी को 24,4  4,4  4,4  4,2 का ही पालन  करना चाहिये । सादार


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 30, 2014 at 12:13pm

आ० डॉ गोपाल जी की बात का समर्थन करते हुए - त्रिभंगी का ये विधान देखिये ----त्रिभंगी के प्रत्येक चरण में 10-8-8-6 पर यति (विराम) आवश्यक है। मात्रा बाँट 8 चौकल अर्थात 8 बार चार-चार मात्रा के शब्द प्रावधानित हैं जिन्हें 2+4+4,  4+4, 4+4, 4+2 के अनुसार विभाजित किया जाता है। इस तरह 2 +  7x 4 +  2 = 32 सभी पदों में होती है।

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 30, 2014 at 12:02pm

आदरणीय रमेश जी

आपकी रचना पर महनीया राजेश कुमारी जी से बात हुयी  i मै अपनी आपत्ति इस बिंदु के साथ वापस लेता हूँ  कि  त्रिभंगी का कोई भी चरण  शायद त्रिकल से आरम्भ करने की परंपरा नहीं है i इसे द्विकल या चौकल से ही प्रारम्भ किया जाना परंपरागत है i

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on June 30, 2014 at 11:36am

मनोहारी त्रिभंगी छंद प्रयास के लिए हार्दिक बधाई 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 30, 2014 at 11:32am

रमेश जी

आपका सुन्दर प्रयास है i अंतिम पंक्ति  में दो बाते है - पहला यह कि  धरा मनोहारी  में जो पहला चौकल है, धराम यह जगण है और त्रिभंगी के किसी भी चौकल में जगण का निषेध है i इसीलिये यहाँ लय भी  बाधित हुआ  है i दूसरी बात 'मातु तुम्हारी ' में आठ केस्थान पर नौ माँत्राए है i प्रसन्नता हा कि आप छंद रचना कर रहे है  i यह रचना कर्म को मांजता है i


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 29, 2014 at 4:41pm

वाह ...बहुत सुन्दर त्रिभंगी छंद ,हार्दिक बधाई आपको रमेश जी 

कृपया ध्यान दे...

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