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“अरे क्या हुआ ये भीड़ कैसी है, कोई मर गया है क्या ?”

“हाँ यार वो साहब का नौकर, अरे वही यार जो साहब के घर के सारे काम करता था, झाड़ू - पोछा, चूल्हा-चौका ,बर्तन माँजने से लेकर सब्जी-भाजी लाने तक....जिसे साहब गाँव से लेकर आये थे, कहते थे चपरासी रखवा दूंगा डिपार्टमेंट में !”

“ओह वो गूंगा, वो तो बड़ा ही भला था और ठीक-ठाक भी, कैसे मरा ?”

“दोस्त, सब कह रहें हैं आत्महत्या कर ली, पर यार तू बताना मत किसी को, मेमसाहब की चेन चोरी हो गयी थी, कल रात पुलिस भी आई थी, बहुत मारा उसे, पर वह गूंगा नहीं था, उसे अरे-माई, अरे-माई, चिल्लाते हुए मैंने सुना था !”

अच्छा ..कुछ मिला क्या उसके पास ?   

“हाँ, साहब का दिया हुआ एक कुरता पायजामा और एक गमछा और उसके माँ- बाप का दिया नाम, ‘कलुआ’ !”

© हरि प्रकाश दुबे

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by Hari Prakash Dubey on January 19, 2015 at 7:28pm

 आदरणीय डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव सर , उत्साहवर्धन के लिए आपका आभार , लगता है आदरणीय " बागी जी " की डांट रुपी दवा असर कर रही है ..हा .हा ...! सादर प्रणाम  ! 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on January 19, 2015 at 6:50pm

गरीब और  असहाय लोगों पर बड़े लोगों के अत्याचार का यस सिलसिला  अनवरत जारी है | और समाज एवं सत्ता पर भी सक्षम ही काबिज है जो ऐसे बेहद मार्मिक खबरें पढ़कर चुप रहते है | सुंदर लघुकथा  के  लिए  हार्दिक बधाई श्री हरिप्रकाश दुबे जी 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on January 19, 2015 at 5:23pm

बहुत सुन्दरता से मार्मिक चित्रण. बधाई आदरणीय हरिप्रकाश जी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 19, 2015 at 12:35pm

आदरणीय हरि प्रकाश भाई , सक्षम का नीरीह के ऊपर अत्याचार का बहुत  मार्मिक वर्नन किया है आपने । लघुकथा के लिये आपको बहुत बधाइयाँ ।

Comment by Archana Tripathi on January 19, 2015 at 10:55am
अति उत्तम कथा।गूंगा नाहोता तो आजीविका कैसे चला पाता?
Comment by JAWAHAR LAL SINGH on January 19, 2015 at 10:48am

बेहतरीन चित्रण लघुकथा के माध्यम से समाज में ब्याप्त बुराई को उभारने की कोशिश अच्छी  है 

Comment by somesh kumar on January 18, 2015 at 11:24pm

बेहद कसे शब्दों में निरीह गरीब की व्यथा को अभिव्यक्त किया भाई जी ,बधाई इस सफल लघुकथा पर 

Comment by gumnaam pithoragarhi on January 18, 2015 at 3:48pm

वाह खूब ,,,,,,,,,, बहुत खूब चित्रण किया है एक गरीब का जिसके पास अपने आप को बेगुनाह साबित करने का एक ही रास्ता नज़र आता है ,,,,,, क्योंकि उसे पता है इल्जाम मेरे ही सर आएगा


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 18, 2015 at 1:39pm

आदरणीय हरि प्रकाश दुबे जी सफल लघुकथा .... बहुत बहुत बधाई 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 18, 2015 at 1:03pm

आ० हरि प्रकाश जी

लघु कथा की नब्ज पकड़ ली आपने i बहुत बहुत बधाई i

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