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212 212 212 2

इक दुआ हमने उम्र भर माँगी ।
अपने दिल मेँ तेरी बसर माँगी ।

पंछी नदियाँ जमीँ फलक तारे ,
हमने सबसे तेरी खबर माँगी ।

बात काँटोँ ने क्या गलत कर दी ,
इक कली गर जो शाख पर माँगी ।

हर तरफ तू ही तू नजर आये ,
देने वाले से वो नजर माँगी ।

कोई पूछे जो गर सफर अपना ,
तेरी जानिब मेँ हर डगर माँगी ।

मौलिक व अप्रकाशित
नीरज मिश्रा

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Comment

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Comment by khursheed khairadi on February 25, 2015 at 10:30am

पंछी नदियाँ जमीँ फलक तारे ,
हमने सबसे तेरी खबर माँगी ।

हर तरफ तू ही तू नजर आये ,
देने वाले से वो नजर माँगी ।

आदरणीय नीरज भाई बहुत खुबसूरत अहसास है इन अशआर में |आप शायद ''2-12 2   12 12   22 "  पर ग़ज़ल कहना चाह रहे हैं |आप थोड़ा सा प्रयास करके इस ग़ज़ल को इसी  बह्र पर करदें तो मज़ा आ जायेगा |इस बहर पर कुछ ग़ज़लें ---

१. फिर छिड़ी रात बात फूलों की \रात है या बरात फूलों की 

२.आँख में शाम से नमी सी है \आज फिर आपकी कमी सी है 

३.आप जिनके करीब होते हैं \वो बड़े खुश नसीब होते हैं 

४ .ज़िन्दगी जब उड़ान भरती है \बाँहों में आसमान भरती है 

और आपका मतला 

इक दुआ हमने उम्र भर माँगी ।
अपने दिल मेँ तेरी बसर माँगी ।

हार्दिक अभिनन्दन |सादर |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 24, 2015 at 12:51am

सुन्दर प्रस्तुति हेतु हार्दिक बधाई.

Comment by ajay sharma on February 24, 2015 at 12:31am

sundar rachna .....bahut khoob 

Comment by Hari Prakash Dubey on February 23, 2015 at 11:06pm

आदरणीय नीरज मिश्रा जी सुन्दर ग़ज़ल है  हार्दिक बधाई आपको इस रचना पर !

Comment by Samar kabeer on February 23, 2015 at 10:47pm
जनाब नीरज मिश्रा "प्रेम" जी ,आदाब,भाई क्या ही अच्छी ग़ज़ल कही आपने, सुनकर दिल बाग़ बाग़ हो गया,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं |

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 23, 2015 at 9:16pm

आदरणीय प्रेम भाई , ग़ज़ल का बहुत अच्छा प्रयास हुआ है , लिखी हुई बह्र के अनुरूप आपके मिसरे नहीं लग रहे हैं, एक बार तक्तीअ कर के देख लीजियेगा ॥

Comment by gumnaam pithoragarhi on February 23, 2015 at 7:02pm

इक दुआ/ हमने उम /र भर माँगी

२१२/ २१२/ १२२ २ ........

क्या मैं सही हूँ बताईएगा ............

Comment by Dr. Vijai Shanker on February 23, 2015 at 6:40pm
हर तरफ तू ही तू नजर आये ,
देने वाले से वो नजर माँगी ।
बहुत खूब, नीरज मिश्रा ' प्रेम ' जी , बहुत बहुत बधाई इस ग़ज़ल पर , सादर।
Comment by maharshi tripathi on February 23, 2015 at 5:07pm

सुन्दर गजल पर आपको बधाई आ. नीरज जी |

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 23, 2015 at 3:00pm

नीरज जी

बहुत अच्छा प्रयास i  सुन्दर i

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