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ग़ज़लों को भी गीला होते देखा है (मिथिलेश वामनकर)

22-22-22-22-22-2

जो रह-रहकर इस सीने में उठता है

तेरा मेरा दर्द पुराना किस्सा है

 

उनकी आँखों से उतरे हर आँसू से

ग़ज़लों को भी गीला होते देखा है

 

खौफ़जदा हूँ अख़बारों की ख़बरों से

आज हुकूमत ने जाने क्या सोचा है

 

अँधियारा क्यूं कायम रहता है दिल में 

तल्ख़ सवालों ने सूरज को घेरा है

 

चार किताबें मेरे हिस्से की दे दो

आखिर इक लड़की ने भी कुछ बोला है

 

झरते पत्तों ने आखिर ये बतलाया

हर एक शज़र को बूढ़ा होना पड़ता है

 

इस मौसम से बात हुई जब आहिस्ता

इस मौसम के साथ ज़माना रोता है

 

उस घटना के सीने पर तारीख लिखी

अब सीने से जर्द लहू सा बहता है

 

पायल की झंकार सुनाकर बातों में

बातों-बातों में शमसीर गलाता है

 

देहाड़ी को आज चला ले मोबाइल

मुस्तकबिल की खातिर ये भी अच्छा है

 

------------------------------------------------------
(मौलिक व अप्रकाशित)  © मिथिलेश वामनकर 
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Comment

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Comment by JAWAHAR LAL SINGH on April 15, 2015 at 10:36pm

मुझको कैसे गजल लिखना आयेगा 

बतला देते शायर यह भी अच्छा है  गुस्ताखी माफ़!

Comment by Hari Prakash Dubey on April 15, 2015 at 10:15pm

खौफ़जदा हूँ अख़बारों की ख़बरों से

आज हुकूमत ने जाने क्या सोचा है.....बहुत  बढ़िया ग़ज़ल ,आदरणीय मिथिलेश भाई  , बहुत बधाई आपको  ! सादर 

Comment by vandana on April 15, 2015 at 9:18pm

अँधियारा क्यूं कायम रहता है दिल में 

तल्ख़ सवालों ने सूरज को घेरा है

बहुत बढ़िया आदरणीय 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 15, 2015 at 6:56pm

आदरणीय मिथिलेश भाई , गज़ल बहुत सुन्दर हुई है , आपको हार्दिक बधाइयाँ ।

आ. समर भाई जी से मै भी सहमत हूँ , वैसे एक शे र और कमसे कम मै नही समझ पाया , लेकिन ये मेरी नासमझी भी हो सकती है -

चार किताबें मेरे हिस्से की दे दो

आखिर इक लड़की ने भी कुछ बोला है

************************************  

झरते पत्तों ने आखिर ये बतलाया

हर एक शज़र को बूढ़ा होना पड़ता है  

उनकी आँखों से उतरे हर आँसू से

ग़ज़लों को भी गीला होते देखा है

 

खौफ़जदा हूँ अख़बारों की ख़बरों से

आज हुकूमत ने जाने क्या सोचा है   --  ये अश आर बहुत सुन्दर लगे ॥ पुनः बधाइयाँ ॥

 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 15, 2015 at 6:01pm

आ० वामनकर जी

बहुत उम्दा  i  समीर कबीर जी की तरह मुझे भी शमशीर गलाना  समझ में नहीं आया . कृपया मार्ग दर्शन करें . सादर .  

Comment by Dr. Vijai Shanker on April 15, 2015 at 11:45am
जो रह-रहकर इस सीने में उठता है
तेरा मेरा दर्द पुराना किस्सा है॥
खूब सूरत प्रस्तुति, प्रिय जीतेन्द्र जी, बधाई, सादर।
Comment by Samar kabeer on April 15, 2015 at 10:54am
जनाब मिथिलेश वामनकर जी,आदाब,आपकी अच्छी ग़ज़लों में एक और इज़ाफ़ा हुवा,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं |
यह शैर मेरी समझ में नहीं आ सका :-

"पायल की झंकार सुनाकर बातों में
बातों-बातों में शमसीर गलाता है"

कृपया समझाने का कष्ट करें |

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