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भूमिजा सुता जनक
चली आज पति संग
त्याग राज वेश सभी
वन  को   विदाई    है ।

वन  भयंकर      पशु
जंगली  आदम  खोर
हड्डियों के ढेर देख 

सीते    घबराई    है ।

प्रभु  राम  सीते  मन
पढ़ मन मुस्कियायें
माया रचने की घडी
कैसी  अब   आई  है ।

देह  धारण     मनुष्य
मिलता बड़े भाग्य से
माया  तेरे  कंधे  बड़ी
जिम्मेदारी  आई    है ।

मौलिक व अप्रकाशित ।

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 11, 2015 at 10:51am

अच्छी  लगी आपकी रचना ! बधाई आपको ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on September 10, 2015 at 8:43pm
सुंदर रचना है सादर बधाई
Comment by Harash Mahajan on September 10, 2015 at 12:31pm
सूंदर रचना हेतु बधाई आ0 पंकज जोशी जी ।........सादर ।
Comment by Pankaj Joshi on September 10, 2015 at 11:50am

dhynwaad mithilesh sir


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on September 9, 2015 at 5:25pm

आदरणीय पंकज जी इस प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई 

कृपया ध्यान दे...

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