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बहुत बेकार सा चर्चा रहा हूँ
मैं सच हूँ, आँख का कचरा रहा हूँ
बहा हूँ मै सड़क पर बेवजह भी
लहू इंसाँ का हूँ , सस्ता रहा हूँ
जो समझा वो सदा नम ही रहा फिर
मै आँसू ! आँखों से बहता रहा हूँ
महज़ इक बूँद समझा तिश्नगी ने
भँवर के वास्ते तिनका रहा हूँ
जलादूँ एक तो बाती किसी की
इसी उम्मीद में दहका रहा हूँ
मुझे मानी न पूछें ज़िन्दगी का
अभी ख़ुद को ही मैं समझा रहा हूँ
किसी के वास्ते खुशियों का कारण
किसी की राह का काँटा रहा हूँ
बहे आँसू ने छू कर फिर जगाया
न जाने कब तलक सोता रहा हूँ
तेरी ही सोच ने मारा है मुझको
तेरी ही सोच में जीता रहा हूँ
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मौलिक एवँ अप्रकाशित
Comment
आदरणीय बड़े भाई गोपाल जी , आपकी स्नेहिल सराहना के लिये आपका आभारी हूँ ।
आदरनीय शुशील सरना भाई , हौसला अफज़ाई का बेहद शुक्रिया आपका ।
आदरणीय रवि भाई , आपकी मुहब्बतों और इनायतों का तहे दिल से शुक्रिया ।
दहका लिखनेव के पीछे कोई विशेष कारण नही है , आदरणीय , बस दहका कहने से मुझे जलता से जियादा सही लगा , ये मेरे मन की बात है कि मै सुलगने से शुरू हो के दहकने तक की क्रिया मे जियादा दर्द पाता हूँ , मै नही जानता कि ये सही है कि नहीं । आशा करता हूँ आपके प्रश्न का उत्तर मि गया हो ।
मुझे मानी न पूछें ज़िन्दगी का
अभी ख़ुद को ही मैं समझा रहा हूँ..........वाहह्ह्ह्हह्ह वाह! गज़ब!
तेरी ही सोच ने मारा है मुझको
तेरी ही सोच में जीता रहा हूँ............मक्ते ने दिल लूट लिया! बेहतरीन!
आ० आपकी गज़लें जिस सहजता से होती है,उसका कायल हो गया हूँ..नमन!
बहा हूँ मै सड़क पर बेवजह भी
लहू इंसाँ का हूँ , सस्ता रहा हूँ-------subhaanallah , bahut khoob
महज़ इक बूँद समझा तिश्नगी ने
भँवर के वास्ते तिनका रहा हूँ
वाह आदरणीय गिरिराज भाई साहिब वाह .... अहसासों में निहित यथार्थ को चित्रित करते अशआर बन्दे के दिल को भा गए … हार्दिक बधाई कबूल फरमाएं आदरणीय सर।
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