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जुबाँ से इस कदर कड़वा तू हरदम बोलता क्यूँ है...

1222  1222  1222  1222

बुराई का बुराई से जहाँ में सामना क्यूँ है

कि इतनी ज़ुल्म की बढ़ती हुयी अब इन्तेहा क्यूँ है...१

 

 हमारी राह में तुमने, तुम्हारी राह में हमने

जो बोये थे वही कटेंगे इतना सोचता क्यूँ है ....२

 

कभी मेरी भी बातें सुन कभी मुझसे भी आकर मिल

तेरी परछाई हूँ मुझसे तू इतना भागता क्यूँ है ..३

  

ज़रा सा देख ले तू इक नज़र मेरे भी बच्चों को

तेरे बच्चों के जैसे हैं, तू इनसे रूठता क्यूँ है ....४

 

मेरे कहने से मिलती है तो रख ले सल्तनत तू ही 

मगर जज़्बात से मेरे तू हरदम खेलता क्यूँ  है ...५

 

तुझे हर वक्त दिखती है, बुराई सौ गरीबों में

इन्हें तू अपने चश्में से हमेशा देखता क्यूँ है ...६

 

कभी तो देख ले हमको भी तू इज़्ज़त की नज़रों से

कसम से यार इस पर भी, तू इतना सोचता क्यूँ है ...७

 

सरासर है गलत तुझको भी ये मालूम है लेकिन

जुबाँ से इस कदर कड़वा तू हरदम बोलता क्यूँ है ...८

         (मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by shree suneel on December 5, 2015 at 9:05pm
आदरणीय नादिर ख़ान साहब, एक से बढ़कर एक ख़ूबसूरत अशआर आपने पेश किये हैं इस ग़ज़ल में.
हार्दिक.. हार्दिक बधाइयाँ आपको इस उम्दा ग़ज़ल के लिए. सादर
Comment by नादिर ख़ान on December 4, 2015 at 3:53pm

आदरणीय लक्ष्मण साहब  आपने रचना को सराहा बहुत  शुक्रिया आपका .. 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 4, 2015 at 11:50am

आ0 नादिर खान जी, बहुत शानदार ग़ज़ल कही है सादर बधाई ।

Comment by नादिर ख़ान on December 3, 2015 at 11:02am

आदरणीय मिथिलेश जी  सही कहा आपने उस मिसरे में सुधार की आवश्यकता है पहले कैसे नज़र नहीं आया वाही सोच रहा हूँ । बहुत शुक्रिया सर इसे कहते है पारखी नज़र ... 

Comment by नादिर ख़ान on December 3, 2015 at 11:01am

जनाब समर साहब हौसला अफ़ज़ाई का बहुत शुक्रिया 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 3, 2015 at 4:37am

आदरणीय नादिर खान सर, बहुत शानदार ग़ज़ल कही है आपने. शेर दर शेर दाद हाज़िर है. इस मिसरे को एक बार और देख लीजियेगा-

//जो बोये थे वही कटेंगे इतना सोचता क्यूँ है//

Comment by Samar kabeer on December 2, 2015 at 11:19pm
जनाब नादिर ख़ान जी,आदाब,अच्छी ग़ज़ल कही है आपने,सुनकर दिल बाग़ बाग़ हो गया,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं ।
Comment by नादिर ख़ान on December 2, 2015 at 8:01pm

आदरणीय श्याम नारायण जी बहुत बहुत शुक्रिया आपको रचना पसंद आयी |

Comment by नादिर ख़ान on December 2, 2015 at 7:59pm

 आदरणीया कान्ता जी आपने रचना को सराहा बहुत शुक्रिया आपका, उत्साहवर्धन   टिप्पणी के लिए आभार। ... 

Comment by kanta roy on December 2, 2015 at 6:41pm

कभी मेरी भी बातें सुन कभी मुझसे भी आकर मिल
तेरी परछाई हूँ मुझसे तू इतना भागता क्यूँ है--------वाह !!! मजा आ गया पढ़कर ! शानदार ग़ज़ल हुई है आपकी ये आदरणीय नादिर साहब। बधाई !

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