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क्यों करते
खुदकी वाह वाही
होती उसकी
फिर बुराई
माना बहुत कुछ
जान गये हो
खुद को भी
पहचान गये हो
न इतना
गुमान करो
खुद का खुद
सम्मान हरो
अच्छे हो
जानो खुदको
इन्सां हो
मानो खुदको ।
चलो भले
अपनी ही चाल
न खींचों
दूसरों की खाल
धीरे धीरे
चलना है
दौड़ना नहीं
बस चलना है ।
जय हो जय हो
का नारा छोड़ो
स्व तारीफ़ से
नाता तोडो ।
एक दिन
पेड़ क्या
बन जाओगे
ज़मीन पर
से क्या
उठ जाओगे
आसमां का
सपना देखो
आईने में
चेहरा देखो ।
इंसान हो
न भूलो कभी
अच्छाई से
न भागो कभी ।
आये हो
वैसे ही जाना होगा
अपना हिसाब
सब यहीं चुकाना होगा ।

मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on October 5, 2016 at 8:42pm

धन्यवाद आदरणीय सुरेश कुमार जी |

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on October 5, 2016 at 8:41pm

धन्यवाद् आदरणीय गिरिराज सर जी |

Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on October 4, 2016 at 12:26pm
मानव के जीवन दर्शन पर आधारित सुन्दर रचना के लिए हार्दिक बधाई आदरणीया कल्पना भट्ट जी।सादर ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 2, 2016 at 12:39pm

आदरणीया कल्पना जी , अच्छी कविता रची है आपने , हार्दिक बधाई आपको ।

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on October 1, 2016 at 8:16pm
आदाब जनाब समर साहब। आपको रचना पसंद आई सार्थक हुई यह कोशिश मेरी । बहुत बहुत शुक्रिया ।
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on October 1, 2016 at 8:15pm
धन्यवाद आदरणीय शिज्जु भैया ।
Comment by Samar kabeer on October 1, 2016 at 2:49pm
मोहतरमा कल्पना भट्ट साहिबा आदाब,बढ़िया कविता लिखी आपने बधाई स्वीकार करें ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on October 1, 2016 at 1:29pm

आ. कल्पना दीदी अच्छी रचना हुई है बहुत बहुत बधाई आपको

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on September 30, 2016 at 6:25pm
धन्यवाद आदरणीय कालीपद प्रसाद जी ।
Comment by Kalipad Prasad Mandal on September 30, 2016 at 5:21pm

सांसारिक सत्य की ओर  इशारा करती आपकी कविता की अभिव्यक्ति बहुत सुन्दर है |आ कल्पना जी 

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