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नख़्ल-ए-दिल रेगज़ार करना था-ग़ज़ल नूर की

नख़्ल-ए-दिल रेगज़ार करना था,
इक तसव्वुर ग़ुबार करना था.
.
तेरी मर्ज़ी!!! ये ज़ह’न दिल से कहे,
बस तुझे होशियार करना था.
.
वो क़यामत के बाद आये थे
हम को और इंतिज़ार करना था.
.
हाल-ए-दिल ख़ाक छुपता चेहरे से
जिस को सब इश्तेहार करना था.
.   
लुत्फ़ दिल को मिला न ख़ंजर को
कम से कम आर-पार करना था.
.
चंद यादें जो दफ़’न करनी थीं
अपने दिल को मज़ार करना था.
.
बारहा दुश्मनी!! अरे नादाँ .....
इश्क़ भी बार बार करना था.
.
शर्त यूँ थी सो हार आये हम,
पीठ पर उस की वार करना था.
.
“नूर” सच बोल कर है क्यूँ ज़िंदा,
उस को तो संगसार करना था.  
.
निलेश "नूर"
मौलिक / अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 25, 2018 at 8:11am

धन्यवाद आ. महेंद्र जी 

Comment by Mahendra Kumar on May 15, 2017 at 11:06am

किस शेर की तारीफ करूँ आदरणीय निलेश जी, सभी एक से बढ़कर एक हैं. इस खूबसूरत ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. सादर. 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 24, 2017 at 10:15am

शुक्रिया आ अनुराग जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 23, 2017 at 10:05am

शुक्रिया आ. गिरिराज जी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 23, 2017 at 10:03am

आदरणीय नीलेश भाई , लाजवाब गज़ल कही है आपने .. शे र दर शेर बधाइयाँ स्वीकार की लिये ।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 21, 2017 at 10:28pm

शुक्रिया आ. शिज्जू भाई 
आभार 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 21, 2017 at 4:49pm

तेरी मर्ज़ी!!! ये ज़ह’न दिल से कहे,
बस तुझे होशियार करना था.
.
वो क़यामत के बाद आये थे 
हम को और इंतिज़ार करना था.//

वाह आ. निलेश भाई क्या खूब कहा आपने लाजवाब!

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 20, 2017 at 3:18pm

शुक्रिया आ. रवि जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 20, 2017 at 3:18pm

शुक्रिया आ. समर सर 

Comment by Ravi Shukla on April 20, 2017 at 1:24pm

आदरणीय नीलेश जी बहुत बढि़या और लय बद्ध गजल कही आपने दिली मुबारक बाद हाजिर है ।

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