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क़दम उठाने से पहले विचार करना था

मफ़ाइलुन फ़इलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन/फ़इलुन

(आख़री शैर में तक़ाबुल-ए-रदीफ़ नज़र अंदाज़ करें और शैर का लुत्फ़ लें)

अगर वफ़ा का चलन इख़्तियार करना था
क़दम उठाने से पहले विचार करना था

ये एक बार नहीं बार बार करना था
बग़ैर नाव के दरिया को पार करना था

हुसूल-ए-इल्म की ख़ातिर भटकते फिरते हैं
ग़ज़ल का फ़न जो हमें बा वक़ार करना था

उठाके बोझ ज़माने का तेरी चाहत में
शऊर-ओ-फ़िक्र की सरहद को पार करना था

वो मेरी तेग़ से मरता तो क्या मज़ा आता
उसी के तीर से उसका शिकार करना था

__________

हुसूल-ए-इल्म :- ज्ञान प्राप्त करना
शऊर :- अक़्ल
तेग़ :- तलवार

--समर कबीर
मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on April 24, 2017 at 3:25pm
जनाब रोहिताश्व मिश्रा जी आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिये बहुत बहुत शुक्रिया ।
Comment by Samar kabeer on April 24, 2017 at 3:24pm
जनाब तस्दीक़ अहमद साहिब आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिये बहुत बहुत शुक्रिया ।
Comment by Samar kabeer on April 24, 2017 at 3:22pm
जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहिब आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिये बहुत बहुत शुक्रिया ।
Comment by Samar kabeer on April 24, 2017 at 3:21pm
जनाब निलेश'नूर'साहिब आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिये बहुत बहुत शुक्रिया ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 21, 2017 at 4:18pm

वो मेरी तेग़ से मरता तो क्या मज़ा आता
उसी के तीर से उसका शिकार करना था//  वाह बेहतरीन शेर हुआ है जनाब समर कबीर साहब, मतला भी बेहतरीन हुआ है। शेर अच्छा हो तो तक़ाबुले रदीफ भी क्या कर लेगा :-)  दाद ओ मुबारकबाद कुबूल फरमाएँ इस गज़ल के लिए

Comment by Sushil Sarna on April 20, 2017 at 10:59pm
Waaaaaaaah shaaaaàndar ahsaas sir haardik badhaaèeeeeeeeeee sir
Comment by दिनेश कुमार on April 20, 2017 at 9:14pm
वो मेरी तेग़ से मरता तो क्या मज़ा आता
उसी के तीर से उसका शिकार करना था... .. वाह वाह वाह। हासिल-ए-ग़ज़ल।
शानदार ग़ज़ल के लिए दिल से .. वाह वाह आ. समर सर।
Comment by रोहिताश्व मिश्रा on April 20, 2017 at 8:52pm
वाह सर
बहुत प्यारी ग़ज़ल
वाआआह
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on April 20, 2017 at 2:09pm
मुहतरम जनाब समर कबीर साहिब आदाब, अच्छी ग़ज़ल हुई है शेर दर शेर दाद और मुबारकबाद क़ुबूल फरमायें
Comment by Mohammed Arif on April 20, 2017 at 12:27pm
वो मेरी तेग़ से मरता तो क्या मज़ा आता
उसी के तीर से उसका शिकार करना था । वाह!वाह!!क्या कहने ।
अगर वफा का चलन इख़्तियार करना था
क़दम उठाने से पहले विचार करना था । बहुत ख़ूब!बहुत ख़ूब!!
शे'र दर शे'र मुबारकबाद आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब ।

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