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सूत्र और सूत्रधार (लघुकथा)/शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"छोटा सा काम हो या बड़ा, छोटा लक्ष्य हो या बड़ा; कुछ हासिल करने के लिए सबसे पहले सूत्र चाहिए, जुगाड़ चाहिए, बस!"
"हां, सूत्र से सूत्र मिलते हैं, कड़ी से कड़ी जुड़ती है, तभी मंज़िल का रास्ता तय होता है!"
इन दोनों की बातें सुनकर तीसरे व्यक्ति ने कहा- "लेकिन मेरे तो यही सूत्र हैं कि लातों के भूत बातों से नहीं मानते, इसकी टोपी उसके सर और उंगली पकड़कर कर पौंछा पकड़ना!"
यह सुनकर चौथा व्यक्ति अपना सीना तान कर खड़ा हुआ और बोला- "इनमें मेरी सफलता के सूत्र भी जोड़ दो। छोटा हो या बड़ा; चपरासी हो या अफ़सर, उसकी कमियों को पकड़ कर शुरू से ही उस पर हावी हो जाओ। ज़रूरत होने पर जूती भी चाटो या पहनाओ और बहुत ज़रूरी हो जाये, तो जूते भी बरसाओ!"
"बिल्कुल सही! जब सब अपने साथ ऐसा ही कर रहे हैं तो हम क्यों न करें!" सब साथी एक सुर में बोले।
"जंज़ीरों और उनकी कड़ियों की परिभाषाएं बदल चुकी हैं!" उनमें से एक ने धीरे से कहा।
(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on September 16, 2018 at 12:30am

कृपया रचना में 'पौंछा 'शब्द के स्थान पर 'पहुंचा/पौंचा' पढ़िएगा।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on September 29, 2017 at 7:58pm
रचना पर उपस्थित हो कर समीक्षात्मक टिप्पणी और हौसला अफज़ाई के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया मुहतरम जनाब सुशील सरना साहब।
Comment by Sushil Sarna on September 26, 2017 at 7:19pm

आदरणीय शहजाद उस्मानी जी , आदाब सुंदर सार्थक और व्यंगात्मक कटाक्ष की इस सुंदर लघुकथा के लिए हार्दिक बधाई सर। पंच लाईन असरकारक है। 

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on September 26, 2017 at 7:00pm
इस रचना पर समय देकर अनुमोदन व हौसला अफज़ाई और विचार साझा करने के लिए सादर हार्दिक आभार आदरणीय समर कबीर साहब, आदरणीय राजेश कुमारी जी, आदरणीय विजय निकोरे साहब, आदरणीय डॉ. विजय शंकर जी, आदरणीय सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' जी, आदरणीय नीता कसार जी, आदरणीय सलीम रज़ा रेवा साहब और आदरणीय महेंद्र कुमार साहब। आपकी टिप्पणियां व मार्गदर्शन हमारी कलम को प्रशिक्षण व हौसला अफज़ाई देतीं है।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on September 26, 2017 at 6:55pm
कृपया रचना में 'पौंछा'शब्द के स्थान पर 'पौंचा' पढ़िएगा।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on September 26, 2017 at 12:01pm

अच्छी व्यंगात्म्क लघु कथा है यही तो हो रहा है आजकल बहुत बहुत बधाई आद० शहजाद उस्मानी जी 

Comment by Mahendra Kumar on September 25, 2017 at 7:53pm

सूत्रों के बहाने अच्छी कलई खोली है आपने आदरणीय. इस उम्दा व्यंग्यात्मक लघुकथा के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. सादर.

Comment by Samar kabeer on September 25, 2017 at 5:49pm
जनाब शैख़ शहज़ाद उस्मानी जी आदाब,बहुत उम्दा लघुकथा लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Nita Kasar on September 25, 2017 at 4:16pm
उम्दा कथा के लिये बधाई आद० शेख़ शहज़ाद भाई उस्मानी जी ।
Comment by नाथ सोनांचली on September 25, 2017 at 4:26am
आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी साहब आदाब, लघुकथा के माध्यम से बढ़िया तंज कसा आपने। हार्दिक बधाई स्वीकार करें

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