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212 1212

मिल गई नई नई ।

हुस्न की परी कोई ।।

झुक गई नजर वहीं।

जब नज़र कभी मिली।।

देखकर उसे यहां ।

खिल उठी कली कली ।

हिज्र की वो रात थी ।

लौ रही बुझी बुझी ।।

खा गया मैं रोटियां ।

बिन तेरे जली जली ।।

कुछ तो बात है जो वो।

रह रही कटी कटी।।

बात कुछ छुपी नहीं ।

चल रही गली गली ।।

याद है अभी तलक ।

जुल्फ थी खुली खुली।।

चूड़ियां खनक उठीं ।

आपकी हरी हरी ।।

चाहतों के दौर में ।

आशिकी पली बढ़ी ।।

कुछ पता न चल सका ।

दिल से कब घुली मिली।।

हार प्रेम का बना ।

जुड़ गई कड़ी कड़ी ।।

वो निहारती मुझे ।

राह में खड़ी खड़ी ।।

नवीन मणि त्रिपाठी मौलिक अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Ajay Tiwari on December 25, 2017 at 11:59am

आदरणीय नवीन जी, एक बहुत कम इस्तेमाल की गयी बह्र में अच्छी ग़ज़ल हुई है. हार्दिक बधाई. सादर  

Comment by Afroz 'sahr' on December 24, 2017 at 4:32pm
आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी जी इस रचना पर बहुत बधाई आपको। जनाब समर साहिब के सुझाव पर गौ़र फ़रमाएं
"हिज्र की वो रात थी"
"लौ रही बुझी बुझी" इस शेर में तकाबुल ए रदीफ़ का दोष है देखिएगा,,
Comment by Samar kabeer on December 24, 2017 at 3:01pm

जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल है, बधाई स्वीकार करें ।

मतले का सानी मिसरा यूँ कर लें :-

'हुस्न की कोई परी'

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 24, 2017 at 9:58am

हार्दिक बधाई।

Comment by Mohammed Arif on December 24, 2017 at 8:05am

आदरणीय नवीनमणि त्रिपाठी जी आदाब,

                               छोटी बह्र की प्यारी ग़ज़ल । हर शे'र इश्क़ के रंग में डूबा नज़र आ रहा है । दिली मुबारकबाद क़ुबूल करें ।

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