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‘सर—---सर---‘, उसने हकलाते हुए कहा –‘सर, मेरे पास जवान, सुन्दर और हसीन लड़कियों की कोई कमी नहीं है. आप उनमे से किसी को चुन लें, पर भगवान् के लिए इस लडकी को छोड़ दें’- उसने बॉस से गिडगिडाते हुए कहा .

‘अच्छा !-----मगर इस लडकी में ऐसा क्या है जो तुम इस पर इतना मेहरबान हो ?’

‘दरअसल------दरअसल -----‘ उससे कहते न बना .

‘अरे बिदास कहो. हमसे क्या डरना ?’

‘सर, वह मेरी बेटी है‘ उसका हलक सूख गया . बॉस की आँखों में विस्मय भरी चमक आयी –‘ अरे ! तब तो यह नामुमकिन है कि हम इस जवान नागिन का जहर न उतारें.’ बॉस ने खौफनाक आवाज में कहा .

 {मौलिक /अप्रकाशित)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on December 30, 2017 at 7:41pm

आपकी एक और बेहतरीन रचना। हार्दिक बधाई आदरणीय डॉ. गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी।

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on December 28, 2017 at 6:30pm

मुहतरम जनाब गोपाल भाई साहिब , उम्दा लघुकथा हुई है ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ।

Comment by TEJ VEER SINGH on December 28, 2017 at 1:31pm

हार्दिक बधाई आदरणीय डॉ.गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी।बेहतरीन लघुकथा।

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on December 27, 2017 at 9:48pm

बढ़िया लघुकथा हुई है आदरणीय| हार्दिक बधाई|

Comment by Mahendra Kumar on December 27, 2017 at 10:39am

बढ़िया लघुकथा है आ. गोपाल नारायण जी. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए.

‘सर, यह मेरी बेटी है‘

सादर.

Comment by Samar kabeer on December 26, 2017 at 2:17pm

जनाब डॉ.गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी आदाब,बहुत उम्दा लघुकथा,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Mohammed Arif on December 26, 2017 at 11:49am

आदरणीय गोपाल नारायण जी आदाब,

                        बहुत ही ज्वलंत और सामयिक लघुकथा । इस लघुकथा के माध्यम से आपने इशारों-इशारों में सबकुछ कह दिया । ज़ियादा कहने की कोई आवश्यकता नहीं है । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

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