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गेटप्रेम (लघुकथा)

पहली दिल्ली यात्रा के दौरान गन्तव्य की ओर जाते समय टैक्सी इण्डिया गेट के नज़दीक़ पहुंची ही थी कि वहां दर्शकों की भीड़ देखकर उसने टैक्सी चालक से कहा - "यह तो इण्डिया गेट है न! ग़ज़ब की भीड़ है! देखने लायक ऐसा क्या है यहां? लोग तो फोटो भर उतार रहे हैं, सेल्फी ले रहे या खाने-पीने में भिड़े हुए हैं?"


"यह मॉडर्न देशप्रेम है साहब! शहीदों के नामों और कामों से कोई मतलब नहीं इन्हें! ये तो बस लोकेशन और गेटप्रेम है!" टैक्सी-चालक ने उसकी तरफ़ मुड़कर कहा -"वैसे आप कहां ठहरेंगे? आप कहें तो एक बढ़िया सी लॉज में ठहरवा दूं आपको!"


"बढ़िया जगह ही जा रहा हूं, जहां भाई-चारा और देश-प्रेम दिखता है और मिलता भी है!"


"कहां पर!" टैक्सी-चालक ने चौंककर पूछा।


"मैं यहां के मशहूर गुरूद्वारे की बात कर रहा हूं!"


"लेकिन आप पंजाबी या सिख तो नहीं लग रहे! कौन जात हो आप?"


"हिन्दुस्तानी मुसलमान हूं भाई! सुना है कि गेट से ही प्रेम बंटने लगता है यहां।" गुरूद्वारे पहुंचने पर उसने कहा।


(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on February 14, 2018 at 10:06pm

आदरणीय मंच/ पाठकगण मेरी उपरोक्त रचना में अंतिम पंक्ति के बाद यदि यह संवाद जोड़ दिया जाए, तो क्या समापन और बेहतर हो सकेगा? :

"सुना तो सही है आपने, लेकिन आप ख़ुद को 'हिन्दुस्तानी मुसलमान' कहने के बजाय केवल 'हिन्दुस्तानी' कहते, तो सुनकर हमें भी अच्छा लगता साहब!" टैक्सी वाले ने मुस्करा कर कहा।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on February 14, 2018 at 10:02pm

रचना पर समय देकर अनुमोदन और हौसला अफ़ज़ाई के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया आदरणीय बृजेश कुमार 'ब्रज' जी और आदरणीय   सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' जी। 

Comment by नाथ सोनांचली on February 7, 2018 at 6:45pm

बहुत बढ़िया बात कहीं उस्मानी साहब। लाख टके की बात। बहुत बेहतरीन लघुकथा पर मेरी दिली मुबारकबाद आपको। सादर

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 7, 2018 at 6:30pm

बहुत ही सार्थक विषय की अच्छी प्रस्तुति की है आदरणीय..सादर

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on February 6, 2018 at 6:51pm

रचना पर समय देकर अपने विचार साझा करने, अनुमोदन और हौसला अफ़ज़ाई के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया आदरणीया राजेश कुमारी जी।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 6, 2018 at 6:31pm

आपकी बात काफी हद तक सही है गुरुद्वारों में फिर भी अमन भाईचारा कायम रहता है उनकी नजरों में सब इंसान हैं बस बहुत बहुत बधाई इस उम्दा लघु कथा पर आद० शहजाद उस्मानी जी 

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on February 6, 2018 at 4:23pm

मेरी इस रचना पर समय देकर अनुमोदन और स्नेहिल हौसला अफ़ज़ाई के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया मुहतरमा रक्षिता सिंह साहिबा, मुहतरम जनाब तेजवीर सिंह साहिब, जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहिब, जनाब समर कबीर साहिब, जनाब तस्दीक़ अहमद ख़ान साहिब, जनाब सलीम रज़ा 'रीवा' साहिब और जनाब डॉ. विजय शंकर साहिब ।

Comment by Dr. Vijai Shanker on February 6, 2018 at 6:58am

सुन्दर ! बधाई ! आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी जी , सादर।

Comment by SALIM RAZA REWA on February 5, 2018 at 7:50pm
वाह वाह... आपकी लघुकथा ने दिल को छू लिया मुबारक़बाद उस्मानी साहिब...
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on February 5, 2018 at 9:35am

जनाब उस्मानी साहिब आदाब , कामयाब लघुकथा हुई है ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमायें।

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