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स्वप्न ....
 
कल तक
चूजे से मेरे स्वप्न
रोशनी से डरते थे
हर वक्त
पलकों से चिपके रहते थे
 
लेकिन आज
वो चूजे से स्वप्न
किशोर हो गए हैं
अपनी दहलीज़ लांघने को
उत्सुक हैं
अपने पाँव के लिए
ज़मीन तलाशते हैं
अपने लिए
उन्मुक्त आसमान ढूंढते हैं
उड़ने के लिए
 
किशोर स्वप्न
व्यस्क होते ही
जताने लगे हैं
अपने अधिकार
पलकों की चौखट के
बाहर भी
 
सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 22, 2018 at 10:58am

बड़ी अच्छी कविता रची है आदरणीय...

Comment by narendrasinh chauhan on June 21, 2018 at 7:40pm

खुब सुन्दर रचना

Comment by Sushil Sarna on June 21, 2018 at 1:10pm

आदरणीय समर कबीर साहिब सृजन आपकी ऊर्जावान प्रशंसा एवं सुझाव का आभारी है। आपका शक सही है , पाँव होना चाहिए , मैंने संशोधित कर दिया है। आपका हार्दिक आभार।

Comment by Sushil Sarna on June 21, 2018 at 1:10pm

आदरणीया रक्षिता सिंह जी सृजन आपकी मनोहारी प्रतिक्रिया का आभारी है।

Comment by Sushil Sarna on June 21, 2018 at 1:10pm

आदरणीय गुमनाम पिथौरगढ़ी जी सृजन आपकी स्नेहिल प्रशंसा का आभारी है।

Comment by Sushil Sarna on June 21, 2018 at 1:10pm

आदरणीया कल्पना भट्ट जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार।

Comment by Samar kabeer on June 19, 2018 at 6:21pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब,अच्छी कविता लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

"अपने पावों के लिए" इस पंक्ति में "पावों" शब्द ठीक है क्या?

Comment by रक्षिता सिंह on June 19, 2018 at 6:49am

आदरणीय सुशील जी नमस्कार!
बहुत ही सुन्दर पंक्तियाँ, हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

Comment by gumnaam pithoragarhi on June 18, 2018 at 8:38pm

वाकई सपने धीरे धीरे रूप बदलते हैं......

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on June 18, 2018 at 7:54pm

चूजे से सपनो में देखा है जिनको उनको पंख लग गए, और वे सब.... जीवन का यथार्थ है| बहुत सुंदर लिखा है आपने आदरणीय सुशिल सरना जी| बधाई स्वीकारें|

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