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पीढ़ी को समझा दे पंकज, खेती ख़ातिर खेत बचा ले----ग़ज़ल

22 22 22 22 22 22 22 22
नाम हमारा लेना छोड़े, धड़कन को अपनी समझाले
रात यहाँ बेचैन गुजरती, सुन ए छोड़ के जाने वाले
सनई ब्रांड सेंट की बू और कीचड़ छाप पहन कर धोती
वो, जूते का ऐड निहारे और फिर अपने पाँव के छाले
नीच अधम अधिकारी-नेता जिन्हें परोसी गईं बेटियाँ
यद्यपि नीच हैं कन्याओं को बिस्तर तक पहुँचाने वाले
एक सुझाव हमारा पी एम छोटा लेकिन भारी है
लाल किले से कहिए भारत वर्ग-भेद का भाव मिटा ले
बोरी भर सोना ले कर भी ढूंढे नहीं मिलेगा भोजन
पीढ़ी को समझा दे पंकज खेती खातिर खेत बचा ले
मौलिक अप्रकाशित 

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on October 15, 2018 at 10:20pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी सर ग़ज़ल को शुभकामनाएं देने के लिए बहुत-बहुत आभार

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 14, 2018 at 6:07pm

आ. भाई पंकज जी, अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।।

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 16, 2018 at 10:38pm

सादर आभार विजय सर

Comment by vijay nikore on August 12, 2018 at 3:12pm

इस अच्छी गज़ल के लिए बधाई, पंकज जी

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 12, 2018 at 12:53am

आदरणीय वसन्त जी बहुत बहुत आभार

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 12, 2018 at 12:52am

आदरणीय रवि सर बहुत बहुत आभार

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 12, 2018 at 12:52am

आदरणीय बाऊजी सादर प्रणाम, आशीर्वाद प्रदान करने के लिए हार्दिक आभार

Comment by बसंत कुमार शर्मा on August 11, 2018 at 9:33pm

लाजबाब गजल वाह 

Comment by Ravi Shukla on August 10, 2018 at 11:49pm

आदरणीय पंकज जी गूढ़़ भाव के साथ अच्छीगजल कही आपने बधाई

Comment by Samar kabeer on August 9, 2018 at 2:18pm

अज़ीज़म पंकज कुमार मिश्रा आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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