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"बहुत दिनों से है बाक़ी ये काम करता चलूँ"

ग़ज़ल

बहुत दिनों से है बाक़ी ये काम करता चलूँ

मैं नफ़रतों का ही क़िस्सा तमाम करता चलूँ

अब आख़िरत का भी कुछ इन्तिज़ाम करता चलूँ

दिल-ओ-ज़मीर को अपने मैं राम करता चलूँ

जहाँ जहाँ से भी गुज़रूँ ये दिल कहे मेरा

तेरा ही ज़िक्र फ़क़त सुब्ह-ओ-शाम करता चलूँ

अमीर हो कि वो मुफ़लिस,बड़ा हो या छोटा

मिले जो राह में उसको सलाम करता चलूँ

गुज़रता है जो परेशान मुझको करता है

तेरे ख़याल से कैसे कलाम करता चलूँ

"समर"हयात का मक़सद बना लिया है यही

चलन वफ़ा का ज़माने में आम करता चलूँ

"समर कबीर"

मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on September 4, 2018 at 2:15pm

जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहिब आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।

Comment by Samar kabeer on September 4, 2018 at 2:13pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब,सुख़न नवज़ी के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।

Comment by Samar kabeer on September 4, 2018 at 2:12pm

जनाब मिर्ज़ा जावेद बैग साहिब आदाब, सुख़न नवाज़ी के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।

Comment by Samar kabeer on September 4, 2018 at 2:10pm

जनाब लक्षण धामी जी आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।

Comment by vijay nikore on September 3, 2018 at 5:53pm

//बहुत दिनों से है बाक़ी ये काम करता चलूँ

मैं नफ़रतों का ही क़िस्सा तमाम करता चलूँ//.........

अच्छे ख़याल की चरम सीमा है आपके इन शब्दों में आदरणीय भाई समर जी। 

नफ़रत, गिला, तुलना आदि में रमा मानव ज़िन्दगी के कितने सुनहरे पल बरबाद कर बैठता है।

सारी गज़ल ही इसी तरह बेमिसाल है। आपको हार्दिक बधाई, भाई समर कबीर जी।

Comment by Ajay Tiwari on September 3, 2018 at 8:58am

आदरणीय समर साहब, खुबसूरत अशआर हुए हैं. हार्दिक बधाई.

Comment by Ravi Shukla on September 2, 2018 at 11:51pm

आदरणीय समर साहब नमस्कार बहुत ही अच्छी ग़ज़ल आपने कही मतले से हुस्ने मतला मुझे व्यक्तिगत रुप से ज्यादा पसंद आया हर शेर उम्दा है दिली मुबारकबाद कुबूल करें

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on September 1, 2018 at 11:13pm

अनुभव, मनोविज्ञान और आध्यात्मिक भाव समेटती बेहतरीन प्रेरक यथार्थपूर्ण ग़ज़ल हेतु और इसे  इस सम्मानित मंच पर  फ़ीचर ब्लॉग में शामिल  किये जाने पर तहे दिल से बहुत-बहुत मुबारकबाद मुहतरम जनाब समर कबीर साहिब।

Comment by Mohammed Arif on September 1, 2018 at 10:33pm

बहुत दिनों से है बाक़ी ये काम करता चलूँ

मैं नफ़रतों का ही क़िस्सा तमाम करता चलूँ वाह! वाह! वाह! ज़िन्दाबाद ! ज़िन्दाबाद ! क्या ख़ूब शे'र कहा है आपने । काश ! हर एक नफ़रत का काम तमाम कर दें ।

अब आख़िरत का भी कुछ इन्तिज़ाम करता चलूँ

दिल-ओ-ज़मीर को अपने मैं राम करता चलूँ  वाह! वाह! कितनी साम्प्रदायिक सद्भावना वाला शे'र है । मज़ा आ गया शे'र को पढ़कर ।

शे'र दर शे'र दाद के साथ दिली मुबारकबाद आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब ।

Comment by Samar kabeer on September 1, 2018 at 10:30pm

जनाब प्रधान सम्पादक महोदय आदाब,मेरी इस ग़ज़ल को फ़ीचर ब्लॉग में शामिल करने के लिए आपका आभारी हूँ ।

कृपया ध्यान दे...

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