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ग़ज़ल- बलराम धाकड़ (वो मेरे साथ था, मेरा शिकार होने तक)

1212, 1122, 1212, 22

अजीब बात है, दुश्मन से यार होने तक,

वो मेरे साथ था, मेरा शिकार होने तक।

उबलते खौलते सागर से पार होने तक,

ख़ुदा को भूल न पाए ख़ुमार होने तक।

हमें भी कम न थीं ख़ुशफ़हमियां मुहब्बत में,
हमारा दर्द से अव्वल क़रार होने तक।

तुम्हारा ज़ुल्म बढ़ेगा, हमें ख़बर है ये,
तुम्हारे हुस्न का अगला शिकार होने तक।

ख़िज़ाओं के ये दरख़्तों से कहो, ज़ब्त करें,
बचा रखें ये पत्तियाँ बहार होने तक।

हर एक ज़िद से पिघलता हूँ, ग़र्क होता हूँ, 
तुम्हारे सर पे नई ज़िद सवार होने तक।

तमाम उम्र मुझे ये कचोटता ही रहा,

मेरा वजूद मेरे तार-तार होने तक।

~मौलिक/अप्रकाशित।

~बलराम धाकड़ 

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Comment

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Comment by Balram Dhakar on October 31, 2018 at 10:27pm

बहुत बहुत शुक्रिया, आदरणीय नीलेश भाई।

तनाफुर का कोई बेहतर हल खोज रहा हूँ। कृपया आप भी कुछ सुझाएँ। 

बचा रखें ये पत्तियाँ बहार होने तक।...

को,

बचा के रक्खें ये पत्ते बहार होने तक।

कर लें, तो ठीक रहेगा क्या?

सादर।

Comment by Zid on October 31, 2018 at 7:37pm

That is brilliant, consistent, Intense... 

You have used shikaar as kaafiya twice!

Comment by डॉ छोटेलाल सिंह on October 31, 2018 at 1:12pm

आदरणीय बलराम धाकड़ जी बहुत ही सुंदर गजल बधाई हो 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 31, 2018 at 11:59am

आ. बलराम जी 
अच्छी ग़ज़ल हुई है .. बधाई ..
अजीब बात, साथ था.. इसके चलते तनाफुर हो रहा है ..
ख़िज़ाओं के ये दरख़्तों से कहो, ज़ब्त करें,... इन दरख्तों कहना ठीक रहता लेकिन बह्र का मसअला हो जाता 
बचा रखें ये पत्तियाँ बहार होने तक।... इस मिसरे की बह्र देख लें 
ग़ज़ल के लिए पुन:  बधाई 

Comment by Balram Dhakar on October 30, 2018 at 11:54pm

हौसला अफजाई का बहुत-बहुत शुक्रिया, आदरणीय तेजवीर सिंह जी।

सादर।

Comment by Balram Dhakar on October 30, 2018 at 11:53pm

बहुत बहुत धन्यवाद आपका, आदरणीय नवीन जी।

सादर।

Comment by TEJ VEER SINGH on October 30, 2018 at 11:08am

हार्दिक बधाई आदरणीय बलराम जी।बेहतरीन गज़ल।

हर एक ज़िद से पिघलता हूँ, ग़र्क होता हूँ, 
तुम्हारे सर पे नई ज़िद सवार होने तक।

Comment by Naveen Mani Tripathi on October 30, 2018 at 2:08am

आ0 बलराम धाकड़ जी अच्छी ग़ज़ल के लिए बधाई ।

Comment by Balram Dhakar on October 29, 2018 at 8:52pm

बहुत बहुत शुक्रिया, जनाब राज़ साहब।

सादर।

Comment by राज़ नवादवी on October 29, 2018 at 6:44pm

आदरणीय बलराम धाकड़ जी, आदाब. वाह, शेर दर शेर सुन्दर ग़ज़ल, दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ. सादर 

कृपया ध्यान दे...

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