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एक मुश्किल बह्र,"बह्र-ए-वाफ़िर मुरब्बा सालिम" में एक ग़ज़ल

अरकान:-12112 12112

न छाँव कहीं,न कोई शजर

बहुत है कठिन,वफ़ा की डगर

अजीब रहा, नसीब मेरा

रुका न कभी,ग़मों का सफ़र

तलाश किया, जहाँ में बहुत

कहीं न मिला, वफ़ा का गुहर

तमाम हुआ, फ़सान: मेरा

अँधेरा छटा, हुई जो सहर

ग़मों के सभी, असीर यहाँ

किसी को नहीं, किसी की ख़बर

बहुत ये हमें, मलाल रहा

न सीख सके, ग़ज़ल का हुनर

हबीब अगर, क़रीब न हो

अज़ाब लगे, हयात "समर"

"समर कबीर"

मौलिक/अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Samar kabeer on July 11, 2019 at 10:54pm

जनाब प्रदीप जी आदाब,ग़ज़ल की सराहना के लिए आपका आभारी हूँ ।

Comment by vijay nikore on July 10, 2019 at 4:33pm

लाजवाब गज़ल मानो दिल में समा गई। बहुत ही अच्छी लगी। दिल से बधाई, भाई समर जी।

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on July 7, 2019 at 6:14pm

आद0 समर कबीर साहब सादर प्रणाम। मेरे लिए तो यह बह्र बिल्कुल नई है, साथ ही साथ मुश्किल भी, पर आपने इसे बड़ी खूबसूरती से निभाया है,, हर शैर मुकम्मल और बरबस मुंह से वाह वाह कहने को मजबूर कर रहे हैं। शैर दर शैर दाद के साथ बधाई देता हूँ। सादर

Comment by Md. anis sheikh on July 7, 2019 at 3:25pm

समर कबीर साहब बेहतरीन ग़ज़ल के लिए बहुत बहुत मुबारकबाद क़ुबूल कीजिये, हर शेर लाजवाब है, इस बहर से  लोग  हाथ खींच लेते हैं आपने बहुत अच्छे से इसे निभाया है जितनी तारीफ की जाये कम है 

अजीब रहा, नसीब मेरा

रुका न कभी,ग़मों का सफ़र    ये शेर तो मैं  क्या कहूं 

बहुत ये हमें, मलाल रहा

न सीख सके, ग़ज़ल का हुनर     आप ही ऐसा बोलेंगे तो हमारा क्या होगा 

एक बार फिर बहुत बहुत बधाई सर 

Comment by Ravi Shukla on July 6, 2019 at 9:42pm
आदरणीय समर साहब मुश्किल बहर में आपने बहुत ही अच्छे अशआर कहे मुश्किल अरकान के कारण ही शायद गैर मुरद्दफ़ ग़ज़ल कही है। यह बहर फउलु फैलुन फउलु फैलुन 121 22 121 22के नजदीक लगी मुझे। बहरहाल इस उम्दा ग़ज़ल के लिए शेर दर शेर मुबारकबाद पेश करता हूं
Comment by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on July 6, 2019 at 1:38pm

क्या खूब कही, ये प्यारी ग़ज़ल,

कठिन थी डगर, निभाई मगर।

वाह आदरणीय समर साहिब

Comment by TEJ VEER SINGH on July 6, 2019 at 10:24am

हार्दिक बधाई आदरणीय समर क़बीर साहब जी। आदाब। लाज़वाब गज़ल।

ग़मों के सभी, असीर यहाँ

किसी को नहीं, किसी की ख़बर

Comment by Ajay Tiwari on July 6, 2019 at 9:24am

आदरणीय समर साहब, वाफ़िर अरबी में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने  वाली बह्रों में से एक है लेकिन उर्दू के मिज़ाज के अनुरूप न होने की वजह से उर्दू के क्लासिकल दौर के किसी शायर ने इसका इस्तेमाल नहीं किया.
इस अड़ियल घोड़े जैसी बह्र को अच्छी तरह साधने के लिए हार्दिक बधाई.

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on July 6, 2019 at 12:15am

आदरणीय बाऊजी प्रणाम

क्या कहने........ग़ज़ल का एक और प्रतिमान पेश किया है आपने... सीखने के लिए बेहतर उदाहरण


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 5, 2019 at 12:20pm

कठिन बहर पर बढिया ग़ज़ल कही आदरणीय ! हार्दिक बधाई

कृपया ध्यान दे...

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