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ये भँव तिरी तो कमान लगे----ग़ज़ल

12112 12112

ये भँव तिरी तो, कमान लगे

तिरे ये नयन, दो बान लगे

कहीं न रुके, रमे न कहीं

इसे तू ही तो, जहान लगे

मैं जब से मिला हूँ तुम से, मिरी

हरेक अदा जवान लगे

अमिय है तिरी अवाज़ सखी

तू गीत लगे है गान लगे

है खोजती महज़ तुझे ही निगा'ह

न और कहीं मिरा धियान लगे

मौलिक अप्रकाशित

Views: 706

Comment

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on July 14, 2019 at 9:43pm

आदरणीय बाऊजी इस ग़ज़ल को सुधारता हूँ, शीघ्र ही

Comment by नाथ सोनांचली on July 12, 2019 at 3:44pm

आद0 पंकज कुमार मिश्र जी सादर अभिवादन। ग़ज़ल का अच्छा प्रयास किया है आपने। बधाई स्वीकार कीजिये। शेष आद0 समर साहब की इस्लाह तो बाकमाल

Comment by Samar kabeer on July 11, 2019 at 11:55am

अज़ीज़म पंकज कुमार मिश्रा आदाब,बह्र-ए-वाफ़िर में ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,लेकिन अभी कुछ कमियाँ हैं,बहरहाल बधाई स्वीकार करें ।

'ये भँव तिरी तो, कमान लगे

तिरे ये नयन, दो बान लगे'

ऊला मिसरे में एक ही भँव का ज़िक्र है,दूसरी कहाँ है?

सानी मिसरे में 'नयन' "दो बान" बहुवचन हैं इसलिए रदीफ़ 'लगे' कि बजाय "लगें" हो रही है ।

'कहीं न रुके, रमे न कहीं

इसे तू ही तो, जहान लगे'

"किसे"?,इस शैर का भाव स्पष्ट नहीं है ।

'अमिय है तिरी अवाज़ सखी'

इस मिसरे में 'अवाज़' ग़लत है,सहीह शब्द है "आवाज़",देखियेगा ।

'है खोजती महज़ तुझे ही निगा'ह

न और कहीं मिरा धियान लगे'

इस शैर के ऊला में "महज़" शब्द का वज़्न 21 है,और सानी में "ध्यान" शब्द को 'धियान' करना कहाँ तक उचित है,आप बहतर समझते हैं ।

एक काम की बात,ग़ज़ल का प्रयास जल्द बाज़ी में कभी नहीं करना चाहिए,इसका हमेशा ख़याल रखें ।

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on July 10, 2019 at 10:04pm
आदरणीय तिवारी जी बहुत आभार
Comment by indravidyavachaspatitiwari on July 10, 2019 at 4:16am

बहुत बढ़िया गजल है। मन प्रसन्न हो गया। 

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