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Priyanka Pandey
  • Female
  • gorakhpur.UP
  • India
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Profile Information

Gender
Female
City State
Gorakhpur - Uttar Pradesh
Native Place
Balrampur
Profession
Housewife

Comment Wall (5 comments)

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At 12:03am on September 3, 2014, सूबे सिंह सुजान said…

आपका आभार , यह मेरे लिये वंदनीय है कि आपने मुझे मित्रता के लिये स्वीकार किया। यहां पर साहित्यिक गतविधियों में जानकारी आदान-प्रदान करने के अवसरों का लाभ मिलेगा।।

At 10:39am on August 11, 2014, डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव said…

मित्रता के लिए बढे हाथ का सादर स्वागत i मै एक अच्छ मित्र बन सकूं यह मेरा संकल्प है i

At 1:20pm on August 4, 2014, लक्ष्मण रामानुज लडीवाला said…

मित्रता का प्रस्ताव स्वीकारते हुए प्रसन्नता है स्वागत है आपका आदरणीया प्रियंका पाण्डेय जी 

At 9:34am on August 4, 2014, जितेन्द्र पस्टारिया said…

आपकि मित्रता का स्वागत है आदरणीया प्रियंका जी

सादर!

At 12:59am on August 4, 2014, vijay nikore said…

मित्रता मेरा सौभाग्य है। धन्यवाद।

Priyanka Pandey's Blog

बस तुम ही थे

पलकों के महके उपवन में

गीतों के सारे सरगम में

हर उलझन में हर सुलझन में

कोई और नहीं तुम ही थे



कुछ बंद किताबों के पन्ने

फिर फिर से जैसे खुल जाए

आखर आखर बन सरगम ज्यो

प्राणों में आकर घुल जाए

नयनो की मोहक चितवन में

कोई और नहीं तुम ही थे



महकी महकी सी साँसों में

तेरी मोहक खुशबू बस जाए

हरपल पलछिन रात और दिन

यादे तेरी सज सज जाएँ

सपनो के खिलते गुलशन में

कोई और नहीं तुम ही थे



श्वाँस श्वाँस मधुरिम स्पंदन… Continue

Posted on September 17, 2014 at 7:29am — 11 Comments

बहुत गहरा गए हैं अंधेरे हर सू

बहुत गहरा गए हैं अंधेरे हर सू

रोशनी की किरन अब कहां खोजें

 

गुम हो गई है कहां दुनिया में

आओ मिल के हम वफा खोजें

 

खतावार जब कि थे हम दोनों ही

क्यूं न इक जैसी ही सजा खोजें

 

जीत जाएं न कहीं दूरियां हमसे

आओ मिल के अपनी खता खोजें

 

नफरतों के वास्ते न जगह बाकी हो

पूरे जहान में एसा कोई पता खोजें

-----प्रियंका

 

"मौलिक व अप्रकाशित" 

Posted on August 12, 2014 at 11:00pm — 4 Comments

सूरज

सूरज............
रोज निकल पडता है चहलकदमी करते
ठिठकता है कुछ देर मेरे शहर में भी
फिर चल देता है
कांधे पर कुछ यादों की गठरी लादे
देखता है मुड कर किसी शाख के पीछे से
कुछ और भी गुमसुम हो जाते हैं
दरख्तों के घने लंबे साए
पर यादें...............
जाने कहां कहां से फिर लौट कर आ जाती हैं
जिन्हें रोज ही सूखे पत्तों के साथ
समेट कर फेंक देती हूं
---------प्रियंका

"मौलिक व अप्रकाशित"

Posted on August 8, 2014 at 2:00pm — 5 Comments

जब बूंदें रिमझिम गिरती हैं

जब बूंदें रिमझिम गिरती हैं

कुछ स्वरलहरियां सी बुनती हैं

हरियाली के इस मौसम में भी

बस फीका सा रह जाता है मन

भीगा भीगा सा ये मौसम.....

भीगी सी वादी और समां

प्यासी धरती हो दृवित चले

पर प्यासा सा रह जाता है मन

रिमझिम बारिश में घंटों रहना

राहों में बस यूं ही संग संग चलना

तेरी उन सारी बातों को

फिर फिर से दोहराता है मन.

मन तुमसे मिलने को तरसे

बूंदों संग आंखें कितना बरसें

इन दोनों की इस बारिश मे

बस रीता सा रह जाता है…

Continue

Posted on August 8, 2014 at 2:00pm — 7 Comments

 
 
 

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