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रौशन जसवाल विक्षिप्‍त
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  • India
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रौशन जसवाल विक्षिप्‍त's Blog

नींद चीज है बड़ी

नींद चीज है बड़ी  उंघते रहिए

बेफिक्री में आंखे मूंदते रहिए

आग लगती है लगे हमको क्‍या

आम दशहरी जनाब चूसते रहिए

मौका मिले तो तंज कर लो

नहीं तो मस्‍ती में झूमते रहिए

आसां नहीं है अ‍हम को तोड़ना

दुनिया अजब है घूमते रहिए

अदाकार आप खूब है जनाब 

सूत्रधार की भूमिका निभाते रहिए

बातें विक्षिप्‍त की है आपसे बाहर

हंसी चेहरे पर कूटिल दिखाते रहिए 

"मौलिक…

Continue

Posted on August 11, 2013 at 8:00pm — 6 Comments

ग़ज़ल

पत्ते जीवन के कब बिखर जाए क्‍या मालूम
शाम जीवन की कब हो जाए क्‍या मालूम

बन्‍द हो गए है रास्‍ते सभी गुफतगू के
अब वहां कौन कैसे जाए क्‍या मालूम

झूठ पर कर लेते है विश्‍वास सब
सच कैसे सामने आए क्‍या मालूम

दो मुहें सापों से भरा है आस पास
दोस्‍त बन कौन डस जाए क्‍या मालूम

विक्षिप्‍त की दुनिया है बेतरतीव बेरंग
कोई संगकार सजा जाए क्‍या मालूम

Posted on April 23, 2011 at 8:19pm — 3 Comments

Comment Wall (8 comments)

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At 7:51am on August 19, 2013, Dr Ashutosh Mishra said…

aapke mitron me shamil hona mere liye harsh ka bishay hai ..aap sabhee ke margdarshan se kavya yatra nirantar naye sopaan taye karegee ..saadar 

At 6:46pm on August 13, 2013, विजय मिश्र said…

भाई रौशनजी ,नमस्कार !

पहले तो आपको आपके इस विचित्र तखल्लुस [उपनाम] 'विक्षिप्त ' के चयन के लिए साश्चर्य बधाई देता हूँ,इतना तो स्पष्ट है कि जिनकी सोंच साफ़ होती है वहीं स्वेम को विचित्र घोषित करते हैं ,सामान्य के बूते का नहीं  और फिर मित्रता के आमंत्रण के लिए हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ .पुनः प्रणाम एवं शुभरात्री .

At 10:39pm on August 12, 2013, केवल प्रसाद 'सत्यम' said…

आपका हार्दिक अभिनन्दन है।   मित्रता से  सौभाग्य का उदय होता है। आपकी मित्रता हमारे लिए दिव्य औषधि के समान है। सादर

At 8:30am on November 15, 2010,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…
At 10:50pm on November 14, 2010,
सदस्य टीम प्रबंधन
Rana Pratap Singh
said…

At 9:37pm on November 14, 2010, Admin said…

At 10:58pm on November 12, 2010, Shanno Aggarwal said…
रोशन जी, हम सभी के बीच आपका बहुत स्वागत है.
At 9:53pm on November 12, 2010, PREETAM TIWARY(PREET) said…

 
 
 

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