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सियासत बिसातें बिछाने लगी है
चुनावी हवा सरसराने लगी है...
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जगा फिर से मुद्दा ये पूजा घरों का
दिलों में ये नफरत बढ़ाने लगी है।
चुनावी हवा.....
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यहाँ बाँट डाला है रंगो में मजहब
बगावत की आंधी सताने लगी है।
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कहीं नाम चंदन कहीं चाँद दिखता
ये लाशें जमीं पर बिछाने लगी है
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नही बात होती है अब एकता की
हमारी उमीदें घटाने लगी है
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क्युँ इन्सां हुआ जानवर से भी…
ContinueAdded by अलका 'कृष्णांशी' on February 3, 2018 at 10:30am — 13 Comments
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