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Krish mishra 'jaan' gorakhpuri's Blog – March 2015 Archive (11)

जो न सोचा था कभी............'जान' गोरखपुरी

२१२२ २१२२ २१२१२

जो न सोचा था कभी,वो भी किया किये

हम सनम तेरे लिये,मर-मर जिया किये

***

तेरी आँखों से पी के आई जवानियाँ

दम निकलता गो रहा पर हम पिया किये

***

आँख हरपल राह तकतीं ही रही सनम..

फर्श पलकों को किये,दिल को दिया किये

***

आदतन हम कुछ किसी से मांग ना सके

और हिस्से जो लगा वो भी दिया किये

***

जख्म को अपने कभी मरहम न मिल सका

गैर के जख्मों को हम तो बस सिया…

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Added by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 31, 2015 at 4:30pm — 15 Comments

गुलाब आँखें(संशोधित)......................‘जान’ गोरखपुरी

२१२२ २१२२ १२१२२



मेरी दुनिया रहने दो अपनी ख़्वाब आँखें

दो जहाँ हैं मेरी ये दो गुलाब आँखें



***



अब तू सम्हल जिंदगी होश खो चुके हम

साकिया ने है पिला दी शराब आँखे



**



ढूंढ लेंगे हम.....रहो पास तुम अगर बैठे

सब सवालों का देती हैं जव़ाब आँखें



***



मेरी मोहब्बत इबादत नफ़स-नफ़स है

रखती हर पल हैं मेरा सब हिसाब आँखें



**



तुम पलक के मस्त पन्ने उलटते जाओ

पढ़ रहा…

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Added by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 27, 2015 at 10:30pm — 10 Comments

दूसरों को....................'जान' गोरखपुरी

खुशियों में होते है सब हमसफ़र..

गम में साथ कोई खड़ा नही होता!

दूसरों को करके छोटा ए-दोस्त...

कोई बड़ा नही होता!

जाने कितनी खायी ठोकरें

लाख रंजिश की गम ने..!

सामने खींचकर बड़ी लकीर

बड़ा बनना सीखा नही हमने..!!

यही करना था तो सियासत आजमाई होती!

हाथ में कलम की न रोशनाई होती..

जंग अदब की मै लड़ा नही होता!!

दूसरों को करके छोटा ए-दोस्त...

कोई बड़ा नही होता!

जिसने रची है सारी ही सृष्टि!

उसने है…

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Added by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 25, 2015 at 8:00pm — 14 Comments

जिसे हर शय में................'जान' गोरखपुरी

१२२२ १२२२

जिसे हर शय में देखा था

नजर का मेरी धोखा था।

भरम तेरी निगाहों का

कोई जादू अनोखा था।

सदी बीती जहां लम्हों

मेरा जग वो झरोखा था।

बरसतीं खार आखें अब

लबों सागर जो सोखा था।

गया न इश्क खूँ रब्बा

चढ़ाया रंग चोखा था।

नसीबी ‘’जान’’ रोये क्यूँ

ख़ुदा का लेखा जोखा था।

******************************************

मौलिक व् अप्रकाशित (c) ‘जान’…

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Added by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 24, 2015 at 8:12pm — 12 Comments

ए-हुस्न-जाना...............'जान' गोरखपुरी

ए-हुस्न-जाना..

दिल नही रहा अब तेरा दीवाना...

अब मुझको आया कुछ आराम है।

कि तेरे सिवा जहाँ में और भी बहुत काम है।

ए-हुस्न-जाना..

दिल अब तुझसे बेजार है..

हुस्नो-इश्क जबसे बना व्यापर है।

हूँ जिसका मै सिपहसलार बेकार वो दिल का रोजगार है।

ए-हुस्न-जाना..

दूंढ़ ले अब कोई नया ठिकाना...

मालूम मुझको तेरा मकाम है।

के तेरे सिवा जहाँ में और भी बहुत काम…

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Added by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 19, 2015 at 4:00pm — 24 Comments

लोग मिलते हैं ...........'जान' गोरखपुरी

2122  2212  1222

लोग मिलते हैं अक्सर यहाँ मुहब्बत से

दिल हैं मिलते यारब बड़े ही मुद्दत से।

आज कल शामें हैं उदास बेवा सी

याद आये है कोई खूब सिद्दत से।

कोई होता है किस कदर अदाकारां

हम रहे इक टक देखते सौ हैरत से।

उसने मुझको यूँ शर्मसां किया बेहद

पेश आया मुझसे बड़े ही इज्जत से।

लबसे तेरे हय शोख़ गालियाँ जाना

बस रहे हम ता-उम्र सुन…

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Added by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 18, 2015 at 4:30pm — 19 Comments

तुमने किया छल! -कृष्णा मिश्रा

तुमने किया छल

भावविभोर विह्वल

जल-थल मन

मन जल-थल !

हर प्रतिमा में ढूंढूँ

बिम्ब तुम्हारे..

अनंतपथ में ढूंढूँ

पदचिन्ह तुम्हारे..

अहा! रहते

तुम सम्मुख सदा..

करते अभिनय नयनों में...

नयनों से ओझल!

तुमने किया छल....

सांझ-सकारे जोहूँ

मै बाट तुम्हारा..

पर सामर्थ्य कहाँ

हृदय में,प्राण में?

भर सकूँ ओज तुम्हारा..

नित्य नए पात्र का

करता मै…

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Added by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 16, 2015 at 10:35am — 18 Comments

'मेहमान' 'जान' गोरखपुरी

ना हाथों में कंगन,

न पैरों में पायल,

ना कानो में बाली,

न माथे पे बिंदियाँ

कुदरत ने सजाया है उसे!!

न बनावट,ना सजावट

न दिखावट,ना मिलावट

गाँव की मिट्टी ने सवारा है उसे!!

ये बांकपन ,ये लड़कपन

चंचल अदाओं में भोलापन,

जवानी के चेहरे में हय!....

हँसता हुआ बचपन!!

वख्त ने जैसे....संजोया है उसे!!

उसकी बातें सुनती हैं तितलियाँ

उसीके गीत गाती हैं खामोशियाँ

हँसी पे जिसकी फ़सल लेती है…

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Added by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 12, 2015 at 3:38pm — 20 Comments

जला न दे...''जान'' गोरखपुरी

112 212 221 212

बस कर ये सितम के,अब सजा न दे

हय! लम्बी उम्र की तू दुआ न दे।

अपनी सनम थोड़ी सी वफ़ा न दे

मुझको बेवफ़ाई की अदा न दे।

गुजरा वख्त लौटा है कभी क्या?

सुबहो शाम उसको तू सदा न दे।

कलमा नाम का तेरे पढ़ा करूँ

गरतू मोहब्बतों में दगा न दे।

इनसानियत को जो ना समझ सके

मुझको धर्म वो मेरे खुदा न दे।

रखके रू लिफ़ाफे में इश्क़ डुबो

ख़त मै वो जिसे साकी पता न…

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Added by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 10, 2015 at 4:35pm — 25 Comments

बला-ए-इश्क़ ‘’जान गोरखपुरी’’

१२२२ १२२२ १२२२ १२२२

कुम्हलाए हम तो जैसे सजर से पात झड़ जायें

यु दिल वीरां कि बिन तेरे चमन कोई उजड़ जायें

मिरी आव़ाज में है अब चहक उसके आ जाने की

सितारों आ गले लूँ लगा कि हम तुम अब बिछड़ जायें

कि बरसों बाद मिलके आज छोड़ो शर्म एहतियात

लबों से कह यु दो के अब लबों से आ के लड़ जायें

न मारे मौत ना जींस्त उबारे या ख़ुदा खैराँ

बला-ए-इश्क़ पीछे जिस किसी के हाय पड़ जायें

बना डाला…

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Added by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 8, 2015 at 5:30pm — 26 Comments

'जिन्दगी'

१२१ २२ १२२

अजीब है ये जिन्दगी

सलीब है ये जिन्दगी

न जान तू किस खता की

नसीब है ये जिन्दगी

इश्क जिसे है,उसी की

रकीब है ये जिन्दगी

गिने जु सांसे, बहुत ही

गरीब है ये जिन्दगी

निकाह मौत तुझसे औ

हबीब है ये जिन्दगी

‘मौलिक व अप्रकाशित’

Added by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 4, 2015 at 11:00am — 14 Comments

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